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20 Mar 2024 · 1 min read

अपने अपने कटघरे हैं

ज़िन्दगी के साज़ सारे बेसुरे हैं
फिर भी कितने ख़्वाब आंखों में भरे हैं

हर किसी को कामयाबी चाहिए
हर किसी के अपने-अपने पैंतरे हैं

यह तरक़्क़ी भी कोई कमतर नहीं है
मुल्क में अब ख़ूब सारे मसखरे हैं

एक टूटा आदमी कब सोचता है
मरुथलों में पेड़ क्यूं इतने हरे हैं

हर कोई आज़ाद होना चाहता है
हर किसी के अपने-अपने कटघरे हैं

— शिवकुमार बिलगरामी —

Language: Hindi
1 Like · 60 Views
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