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Jul 22, 2016 · 1 min read

अपने.अपने आईने

अपने.अपने आईने

शहीदी सींच से
आज़ाद धरा पर
जो पली थी
जनतंत्र फ़सल
उसमें
स्वार्थी किरचें
ख़रपतवार सी उगीं
और
जनने लगी आईने
अब
अपने – अपने चेहरे
अपने – अपने आईने ।

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