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Aug 5, 2022 · 27 min read

Someone unexpected Hindi story by Komal Agarwal

[4/20, 21:35] Komal Agrawal: हिंदी कहानी-Someone unexpected लेखिका- कोमल काव्या

रोशन की उंगलियाँ अब भी स्नेहलता की चूड़ियों में उलझी हुई थी. नींद की खुमारी और ठंडी हवा के झोंके उसे गुदगुदा रहे थे. एकाएक थोडा कोलाहल उसके कानों को विचलित करने लगा. वह झटके से जागा. यात्री अपना अपना सामान उठाकर बस से उतर रहे थे. उसे लगा मानों उस पर किसी ने घड़ों बोझ रख दिया हो. तो क्या अभी तक वो स्वप्न देख रहा था? स्नेहलता की चूड़ियों की खनक और उसका माधुर्य उसके कानों में रस घोलने लगा. कहाँ हो तुम? कहाँ हो तुम? वह मंत्रमुग्ध सा बुदबुदा उठा. मगर वो कहाँ चीन ही उसके होने का कोई चिन्ह शेष रह गया था. बस दबारा चलने लगी, जैसे जैसे बस आगे की तरफ दौड़ती जा रही थी वैसे वैसे उसका मन अपने अतीत में पीछे की तरफ दौड़ रहा था. वह फिर बुदबुदाया, स्नेह, तुम कहाँ हो? तुम क्यूँ चली गयी? तुमने मुझे क्यूँ नहीं पुकारा? सचमुच ही तो स्नेह ने उसे नहीं पुकारा था, न ही पलटकर देखा था उसके ओझल होते अक्स को. रोशन को याद हो आया विवाह के पहले का देखा स्नेह का वो मकान जहाँ उसने पहली बार न जाने कितने सगे सम्बन्धियों की नजर बचाकर स्नेह को देखा था. एक भरपूर निगाह से और मानों उसकी दृष्टि ठहर गयी थी. चूडीदार सूट पहने जब स्नेह ने कमरे में प्रवेश किया तो रोशन को लगा जैसे पूरा चाँद उसके चेहरे में उतर आया है. अकस्मात् ही स्नेह ने उसे जब देखा तो उसकी नजरें ठहर गयी ऐसा ही तो चेहरा था जिसे वह अपने मन के कैनवास पर उभारती आई है.और हरदम ये सोचती की क्या सचमच में ऐसा कोई सुदर्शनयुवक होगा जो उसकी डोली लेने अकस्मात् ही चला आएगा. उसने अपनी आँखें बंद कर ली और मन ही मन वाहेगुरू का धन्यवाद करने लगी. बहुत कम दिनों में उनका विवाह संपन्न हो गया.
उसी मकान के सामने जैसे बेहोशी की हालत में पंहुचा है आज वो यहीं से विदा हो चली आई थी स्नेह उसके साथ, उसने दरवाजे पर दस्तक दी. रात के तक़रीबन दस बजने को थे. कुछ एक मिनटों में दरवाजा खुल गया जिसे पवन भाई साहब ने खोला था. रोशन को सामने देखकर वह अचकचा से गए
और फिर बहन को निष्ठुरता से दुत्कार दिए जाने की घटना क्रमशः एक एक कर उनके मानस पटल पर उभरने लगी. मगर जो भी हो अवांछित अतिथि को द्वार से लौटना मुनासिब न समझकर उन्होंने बेमन से उसे अन्दर आने की मौन स्वीकृति दे दी. रास्ता देने पर रोशन चुपचाप एक छोटी सी बैठक में आ गया
और चोर नजरों से इधर- उधर किसी को ढूंढने लगा. उसके पीछे . पीछे पवन किनारे लगे दीवान पर बैठ गए और उन्होंने रोशन को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया. रोशन के बैठते ही उन्होंने उससे उसका हाल चाल पूछा और बड़ी सावधानी से उसकी नौकरी वगैरह के बारे में पूछ ताछ करने लगे. बैठक में शब्द सुनकर पवन की पत्नी जसविंदर चली आई. नियति अपने ही लिखे पष्ठों के पन्ने उलटने लगी. पति पत्नी के चेहरे पर प्रश्नचिंह छपे हुए से मालूम हो रहे थे. आज इधर कैसे आना पड़ गया? पति की चुप्पी सह न पाने की विवशता में जसविंदर व्यंग्य कर ही बैठी. मगर रोशन पर उस व्यंग्य का कोई असर नहीं हुआ. वह एकाएक कुर्सी से उठा और पवन के पैर पकड़कर रोने लगा. मुझे माफ़ कर दीजिए, मैं नहीं जानता था की क्या कर रहा हूँ और वो भी किसके साथ. बहत अन्याय किया मैंने आप सभी के साथ. पवन उसे समझाते हुए बोले, अब रहने दो, जो हो चूका उस पर आंसू बहाने से क्या लाभ. मगर रोशन के आंसू थम ही नहीं रहे थे. वह भारी कंठ स्वर में बोला – जरा स्नेह को बुला दीजिए. मैं उसे और अपनी बेटी को लेने आया हूँ अच्छा , वो अब यहाँ कहाँ हैं, जसविंदर तुनक कर बोली, हमे तो कब का पराया कर चली गयी वो. बाबूजी ने उसके नाम गाँव का मकान जो लिख दिया. दरअसल पिता ने पवन को शहर का और लाडली बेटी को गाँव का मकान पैत्रिक संपत्ति के रूप में दिया था और इसी फैसले से नाराज थी जसविंदर जिससे वह ननद को अपना शत्रु समझने लगी थी.
और उस पर पड़ोस में रह रहे मिलिंद से जसविंदर ने अपनी छोटी बहन के विवाह का मन बना रखा था पर स्नेह और मिलिंद की मित्रता बचपन से कुछ ऐसी गाडी थी की मिलिंद उसके सिवा किसी से विवाह करने को तैयार ही नही होता था. उसके परिवार वालों ने यह कह कर रिश्ता खारिज कर दिया की वो कम पढ़ी लिखी लड़की को अपने वकील पुत्र के साथ नहीं ब्याहेंगे. इस पर भाभी ने स्नेह के जरिए मिलिंद पर दबाव बनाना चाहा की एक बार वो उसकी छोटी बहन को देख भर लें. मगर स्नेह जोश में बोली, जब उसे नहीं पसंद तो आप जिद्द पर क्यूँ अड़ी हैं। अपनी बहन के लिए कोई और सुपात्र खोजें. इधर रोशन को सामने देख जसविंदर क्रोध से कहने लगी. हमारा उससे कोई वास्ता नहीं तो आपसे क्या मतलब, आप गड़े मुर्दे उखाड़ने क्यूँ चले आयें हैं? बेहतर हो की उलटे पैर वापस लौट जाइए. पवन बाबु ने जैसे तैसे पत्नी को अन्दर भेजा और रोशन से बोले. वो गाँव के अस्पताल में नौकरी करने लगी है और साथ ही यह भी जोड़ना नहीं भूले की स्नेह ने स्वेच्छा से ही घर छोड़ा है. गाँव के मकान का पता

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लेकर रोशन निराश मन और थके कदमो से वापस बस अड़े की तरफ चला. गाँव जाने वाली बस थोड़ी ही देर में उसे मिल गयी . बस के अन्दर की बत्ती बझते ही उसका मन अशांत हो उठा, अगर स्नेह वहां भी न मिली तो वह उसे कहाँ खोजेगा. वह तड़प उठा, स्नेह, तुम्हे मुझे क्षमा करना ही होगा. उसने निराकार के सामने हाथ जोड़ दिए. लैंप पोस्ट की बत्तियां जुगनुओं सी झिलमिलाने लगी और रोशन के मन के अन्दर एक आशा की ज्योति जली. वर्षों पहले स्नेह ने जो प्रेम से सराभोर तीन शब्द उसे फोन पर विवाह से पहले कहे थे वो किसी मंदिर की घंटियों की तरह उसके कानों को झंकृत करने लगे. दुसरे ही दिन उसने आर्ट गैलरी से एक बड़ा सा कार्ड खरीदकर स्नेह को लिख भेजा, why do you love me? एक सप्ताह के लम्बे इंतज़ार के बाद उसे अपनी भावी वधु का भेजा एक छोटा मगर खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड मिला जो अद्भुत कौशल से बनाया हुआ जान पड़ता था. दो हाथों में हाथ लिए जोड़े किसी अनजानी डगर पर चले जा रहे थे. उसने कार्ड खोला, ये क्या लिखा था, रोशन विस्मित हो उठा . गोल्डन डोरी को बड़े करीने से घुमा कर लिखा गया था because you are unexpected. सहागरात पर नव वधु की कलाइयों को थाम वो बार बार उसे छेड़ता रहा, क्या सचमुच मैं unexpected है. स्नेह लाज से मुस्कुराती कहती की तुम मेरी ज़िन्दगी का एक unexpected dream हो जो पूरा हो गया है और अब मुझे किसी वस्तु की चाह नहीं. विवाह के एक महीने पुरे होते ही वो हंसमुख पति के साथ अम्बाला चली आई जहाँ रोशन की Civil engineering की जॉब थी. पहली मंजिल पर बने एक किराये के मकान को उन्होंने अपना स्वप्महल बना लिया था और उसी के नाम की तख्ती बाहर टांग दी गयी. बाहर पर्यों पर छोटी छोटी घंटियाँ बजती और जैसे ही शाम ढलती . वह दरवाजे पर आकर ठिठक जाती, सीढियों पर किसी के कदमो की आहट पाकर दरवाजा खोलने को उद्यत होती पर उसी क्षण विवेकी मस्तिष्क मार्ग अवरूद्ध कर देता, न जाने अनजान शहर में कौन हो. घंटी बजने पर वह पूछती, कोन? कभी कभी तो रोशन बिलकुल चुप हो उसके दुबारा बोलने का इंतजार करता , तो कभी डरावनी आवर्जे निकल उसके परेशान करता, वह चिल्ला कर गुस्से से कहती , मुझे पता है की कौन है. तो वो मुस्कुरा कर कहता , वही तुम्हारा someone unexpected.एक झटके में द्वार खुल जाता और स्नेह पति की फैली बाहों में समा जाती. परे दिन का बोझ दोनों के मन से एक पल में उतर जाता और वे एक दूसरे के गहरे प्यार में घंटो डबे रहते. स्नेह सोचती , कितने कम नव विवाहित जोड़े ऐसे होते होंगे जिनके जीवन में ऐसी बहार होगी. वो दिन उसके लिए किसी सुनहरे स्वप्न से कम न थे.. अब तो चलो अमृतसर , मैंने तुम्हे पाने के लिए जो मन्नत मांगी थी वो पूरी हो गयी है, हम दोनों को अमृतसर जाकर मत्था टेकना है, स्नेह दुलार से पति को कहती. मगर काम के भारी बोझ तले दबा रोशन उसकी यह मांग पूरी नहीं कर पा रहा था. शादी के लिए वह पहले ही दो महीनो की छुट्टी ले चूका था. एक साल में वह स्नेह को दो बार मायके छोड़ और लिवा लाया था मगर इस बार जब वह स्नेह को लिवाने अपने ससुराल पहुंचा तो एक खुशखबरी उसके आगमन की प्रतीक्षा में थी. … क्या थी वो खुशखबरी? जानना चाहते हैं न आप तो मैं कोमल काव्या आपको ले चल रही हूँ एक ऐसे सफ़र पर जहाँ संबंधो की कसक है, चुनौती है और प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति है… कहानी का दूसरा भाग जल्द ही आपको मिलेगा. अगर कहानी पसंद आ रही है तो अवश्य साझा करें और मुझ तक अपने विचार पहुंचाएं.
लेखिका- कोमल काव्या
[4/20, 21:35] Komal Agrawal: हिंदी कहानी – Someone unexpected – दूसरा भाग
लेखिका –कोमल काव्या
प्रिय पाठकों , कहानी के प्रथम भाग में आपने पढ़ा की रोशन जो पेशे से engineer है अपनी वर्षों पहले बिछड़ गयी पत्नी और बेटी को लेने ससुराल पहुँचता है पर पत्नी को उसके भाई के घर न पाकर उसके मनन की दशा और बिगड़ जाती है. क्या रोशन उसकी पत्नी से मिल पायेगा?क्या वह उसे फिर अपना लेगी? और आखिर वह कौन सा अन्याय था जो उसने अपनी निर्दोष पत्नी के साथ किया था.
जान्ने के लिए पढ़ें आगे…
बस में लेते रोशन की आँखों में नींद का नामो निशाँ न था.रह रह कर उसे बीती शाम हुई घटना याद आ रही थी जब गैलेक्सी वर्ल्ड के सामने वर्ल्ड के पास से गुजरते वक्त एक कार से टकराते टकराते बचा था वो. कार चालक जब दरवाजा खोल उसके सामने आया तो रोशन के चेहते पर नफरत के भाव उभरने लगे. एकाएक मिलिंद ने पुकारा, रोशन भाई , आप? इससे पहले की रोशन कुछ बोल पाटा तभी एक युवती कार का दरवाजा खोल मिलिंद के नजदीक आती हुई बोली, यहाँ क्यूँ रुक गए?क्या किसी को चोट लग गयी उसने रोशन की तरफ संकेत करते हुए मिलिंद से पूछा. रोशन ने शाम के धुंधलके में उस युवती के चेहरे की तरफ गौर से देखा, ये तो स्नेह नहीं कोई और है. तो क्या स्नेह मिलिंद के साथ नहीं रहती?वह सोच ही रहा था की मिलिंद ने हाथ आगे बाधा कर उसकी उँगलियाँ थाम ली और बड़े अनुनय से पूछने लगा, कैसें हैंआप? रोशन ने जैसे विस्मय से पलकें झपकाई. मिलिंद अब उस लम्बे कद की आकर्षक युवती की तरफ इशारा करके बोला, मेरी मंगेतर अनु. युवती ने हाथ जोड़ रोशन का अभिवादन किया. रोशन ने हौले से उसे नमस्ते कहा. मिलिंद ने युवती को कार में बैठने को कहा फिर हाथ पकड़कर रोशन को एक किनारे ले गया.मई जानता हूँ आप क्या सोच रहें हैं. मैंने कई बार आपको फ़ोन किया और आपको समझाने की कोशिश भी की पर आप समझने को तैयार ही नहीं हुए. यहाँ तक की उसके कहने पर यहाँ भी आया और आपके मकान पर गया पर वहां ताला पड़ा हुआ था. आपके मकान मालिक भी आपके विषय में कुछ बतानी को असमर्थ थे. रोशन हाथ बांधे अपने आइरों के नीचे की जमीं कुरेद रहा था. शर्म से झुकी नजरें और जिस अतीत को भुलाने की प्रक्रिया में वह काम में सर से पाऊँ तक खुद को डूबा चूका था वही अतीत ने जैसे उसका पीछा करते हुए सड़क पर आज उसका गिरेबान पकड़ लिया था और मानों उससे पूछ रहा था , क्यूँ? कैसी रही. उसके शब्द उसके गले में अटकने लगे तब भी वह खुद को ज़ब्त कर बोला तो क्या तुम्हारी और स्नेह की शादी नहीं हुई?
मिलिंद के चेहरे पर व्यंग्य की कई रेखाएं खिंच गयी फिर वह एक खोखली हंसी हंसकर बोला, कल मेरी कोर्ट मैरिज है , आपसे झूठ नहीं कहूँगा, कोशिश मैंने बहुत की थी गुड्डी से शादी करने की, गुड्डी स्नेह के बचपन का नाम था, जब आने उसे घर से निकाल दिया तो वह बुरी तरह टूट गयी थी तब मैंने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा ये सोचकर की उसे कोई तो सम्हाले मगर वह बोली की उसने सिर्फ और सिर्फ अपनी बेटी के पिता से प्यार किया है जो मैं तो कटाई नहीं हूँ. एकाएक मिलिंद ने आकाश की तरफ ताका और फिर कहने लगा, अगर वाहेगुरु इंसाफपसंद है तो एक दिन वह मेरे साथ अवश्य इन्साफ करेगा क्यूंकि सिर्फ वही जानता है की मेरा आपकी पत्नी के साथ किसी भी तरह का कोई अनैतिक सम्बन्ध नहीं रहा है. हम केवल गहरे मित्र रहे थे और जब आप इस ग़लतफ़हमी का शिकार हो गए तो वह मित्रता भी गुड्डी ने तोड़ दी और मुझसे दूरी बना ली. रोशन बड़ी मुश्किल से अपने आंसू रोक रहा था फिर उसने पूछा, बता सकते हो स्नेह और मेरी बेटी का क्या हुआ?
वो दोनों कहाँ हैं?
मिलिंद एक व्यंग्य भरी हंसी हंसकर बोला, होगा क्या? दोनों अभी भी जिंदा हैं और सुना है की नौकरी कर अपना खर्च चलाती हैं क्यूंकि भाई भाभी ने अपने ही घर में पराया कर दिया.बिना माँ बाप की लड़की के दुर्भाग्य ने उसका पीछा कभी नहीं छोड़ा.
रोशन ने व्यग्र होकर पूछा, तो क्या तुम सहारनपुर में नहीं रहते? नहीं, दो बरस होने को आए मई दिल्ली में वकालत की प्रक्टिस कर रहा हूँ, मिलिंद ने जवाब में कहा , और कार की तरफ देखते हुए कहा , अम्बाला तो अनु के लिए आया हूँ , मेरा ससुराल यहीं है .. सांझ का धुंधलका रोशन के दिल में भयानक हाहाकार करने लगा. पर किसी तरह खुद को संयत कर उसने मिलिंद से अंतिम विदा ली और
कार तक जाकर दोनों को अनेकों आशीर्वाद दिए और उनके सुखी जीवन की मंगलकामना की. मिलिंद से हाथ मिलाते वक़्त उसकी आँखें छलछला उठी. उसने दुआ में हाथ उठाये , जैसे मेरा प्यार बिछड़ा किसी का न बिछड़े.
तो पढ़ रहें हैं आप मेरी यानी कोमल काव्या की लिखी कहानी someone unexpected रोशन और स्नेह की जिंदगानी .

2 अगस्त रविवार की रात जब रोशन अम्बाला से सहारनपुर जाने वाली बस में बैठा तब तक स्नेह ने उसे फ़ोन करके बता दिया था की उसके लिए घर पर एक सरप्राइज प्लान किया गया है और उसे जल्द ही उस ख़ुशी को सेलिब्रेट करने आना होगा. वर्षा की मनोरम बूँदें उसके गालों को भिगो रही थी. लगभग दस बारह रोज बाद वह पत्नी से मिलने जा रहा था. जैसे ही वह घर में दाखिल हुआ स्नेह दरवाजे तक आकर उसका हाथ पकड़ उसे खींचती हुई बोली , कितनी देर लगा दी?क्या बस लेट हो गयी थी? रोशन ने रेन कोट उतारकर स्नेह के हाथ में देते हुए कहा , देख तो रही हो की कैसी झमाझम बारिश हो रही है. लगता है आज पूरा शहर ही बह जाने वाला है. स्नेह मुस्कुराई , आज शहर नहीं बल्कि आप ही ख़ुशी में बह जाने वाले हैं और फिर सचमुच रोशन के पैर ख़ुशी से जमीन पर नहीं टिके, नव युगल की ज़िन्दगी में नया मेहमान जो आने वाला था. मगर ये क्या? भाई भाभी के चेहरे पर जो उत्साह दिखना चाहिए था वो नदारद था. उन दोनों को यह खल रहा था. जब रोशन ने स्नेह से पूछा तो वो उदास स्वर में बोली, पता नहीं आजकल भाभी ठीक से बोलती नहीं इसलिए शायद भाई साहब भी रूठे रहते हैं. चलो अब अपने घरौंदे में लौट चलें, बाबूजी की बरसी का काम भी तो ठीक ठाक हो ही गया. और फिर दोनों बिना किसी पूर्व सुचना के अपना सामान बाँध वापस लौट आये अम्बाला. आते ही वह स्नेह को लेडी डॉक्टर के पास दिखने ले गया था ताकि उसका पूरा पूरा ख़याल रखा जा सके. अब वह जल्दी वापस घर आने लगा था और स्नेह को कभी पास के पार्क में घुमाने ले जाता तो कभी वे बालकनी में बैठकर बातें किया करते. उनके जीवन में सरसता और नवीनता ने फिर पैर पसारना शुरू कर दिया पर दोनों इस बात से अनजान थे की भाभी के अपमानजनक व्यवहार के पीछे क्या रहस्य छुपा था और उनके जीवन में कैसी अनहोनी होने जा रही थी.
कुछ ही रोज बाद मकान मालिक गुलेरी साहब ने ने उसे एक पत्र दिया जो सहारनपुर से आया था मगर लिफाफे पर उसका नाम लिखा था. उसने सोचा , शायद स्नेह के बैंक अकाउंट से सम्बंधित कोई कागजात होंगे. बैठक में वह चाय की चुस्कियां लेता हुआ लिफाफा खोलने लगा. स्नेह खाना बनाने में व्यस्त थी. पत्र का मजमून देखकर वह उसे एक ही सांस में पढता चला गया. लिखने वाले ने रोशन के लिए सहानुभूति का चक्रव्यूह रचा था और लिख भेजा था , पराये बच्चे को अपना समझने की भूल कदापि न कीजियेगा क्यूंकि ये आपकी नहीं बल्कि स्नेहलता और वकील साहब के अनैतिक सम्बन्ध की निशानी है.अगर फिर भी यकीन न आये तो सहारनपुर के रिश्तेदारों से कन्फर्म किया जा सकता है. भेजने वाले ने पूरी गोपनीयता बरती थी इसलिए रोशन को भेजने वाले के सम्बन्ध में कुछ पता न चल सका मगर इस घटना के बाद जैसे वह जैसे वह शुन्य में विलीन हो जाना छह रहा हो. अपने प्रश्न का जवाब किस्से मांगे यह सोच सोच कर उसकी पसलियों में जैसे खून जैम रहा हो और इधर स्नेह परेशान थी की हर समय शरारत करने वाला पति अब उसकी तरफ देखता भी न था, आखिर उससे कहाँ भूल हो गयी? दुसरे ही दिन रोशन दौरे पर चला गया, यहाँ तक की उसने स्नेह का फ़ोन उठाना भी बंद कर दिया. कुछ दिनों तक इधर उधर भटकने के बाद आखिरकार सहारनपुर जा पहुंचा , पता लगा की पवन भाई साहब चंडीगढ़ गए हैं. उसने सोचा अच्छा ही हुआ उनके सामने वह भाभी से कुछ भी न पूछ पाटा. उसे लगा भाभी कहेंगी सब झूठ है पर ये क्या? भाभी तैश में आकर बोली, मई तो पहले ही इस शादी के किलाफ थी मगर आपके भाई साहब की आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ था. सब जानते हैं की मिलिंद से गुड्डी की कितनी अच्छी दोस्ती है. इसलिए तो न उसे शादी करने देती है और अब उसे बांधे रखने के लिए एक नया नाटक. उसी ने मेरी छोटी बहन से उसका रिश्ता नहीं होने दिया नहीं तो मिलिंद तो विवाह के लिए तैयार बैठा था, भाभी लगातार झूठ बोले जा रही . रोशन फुफकार उठा, वह मिलिंद की तरफ चला , जो भी हो आज वह मिलिंद का खून बहा कर ही दम लेगा भाभी रास्ता रोक बोली, हमारी भी कोई इज्जत है, समाज में कहीं मुंह दिखने नहीं छोड़ेंगे आप दोनों, इतना ही साहस है तो घर जाकर अपनी बीवी से सवाल जवाब करें. रोशन घर वापस लौट आया. घर पहुँच अपना कमरा बंद करके लेट गया. स्नेह रोटी रही और दरवाजे को तोड़ने की हद्द तक उसे धक्का देती रही साथ ही रोशन से मिन्न्नातें करती रही पर दरवाजा नहीं खुला. सुबह तक रोशन अपना सामान बाँध चूका था. आज वह चला जाएगा सदा के लिए. तेज आवाज से दरवाजा खुला. स्नेह भयभीत हो उठ बैठी. रात से वह दरवाजे के बाहर ठन्डे फर्श पर विपन्न अवस्था में पड़ी थी , तेज बुखार से उसकी समूची देह जल रही थी. पति के साथ यह उसका आमने सामने का युध्ह था. न जाने कब से वह कारावास भुगत रही थी. आज तम्हे बताना ही होगा आखिर मैंने क्या अपराध किया है, वो तड़प कर बोली. उसने पति को झकझोर कर रख दिया. तभी एक भरपूर तमाचा उसके गाल पर आ पड़ा. फिर एक के बाद कई तमाचे रोशन ने उसे जड़ दिए. दर्द और भय से वह चीखने लगी. रोशन ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया फिर एक कागज़ का टुकड़ा निकाल उसकी तरफ फेंकते हुए बोला, पढो इसे और मेरी बर्बादी पर जश्न मनाओ. मुझे नहीं पता था जिसे इतना प्यार किया वह मुझे मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है. इतना कहकर वह उसे धक्का देता हुआ और लातों से लहुलुहान करता हुआ तीर सा बाहर निकल गया. जब लोगो ने चीख पुकार का शब्द सुना तो सब जमा हो गए पर किसी की रोशन को रोकने की हिम्मत न हुई. ऐसी भीसन घटना से आतंकित मकान मालिक ने लोगो की मदद से सहृदयता दिखाते हुए स्नेह को पहले तो अस्पताल पहुँचाया फिर स्नेह के फ़ोन से पवन को साड़ी घटना की जानकारी दी.
बस में सफ़र करते रोशन की आँखों से अनवरत आंसू बह रहे थे. उसका मन घृणा से भर उठा था. उसका जी कर रहा था की पत्र लिखने वाले और जसविंदर भाभी दोनों को सूली पर लटका दे मगर अब हो ही क्या सकता था जब वो इ अपने सुख का दुश्मन बन बैठा तो दूसरों को या हालात को जिम्मेदार ठहराना कहाँ तक उचित था. मकान मालिक गुलेरी साहब के कई बार फ़ोन करने के पश्चात जब वो अम्बाला लौटा तो स्नेह को सहारनपुर गए दो महीने से ज्यादा हो चुके था. उसने ख़ामोशी से मकान खाली किया और दूसरी कॉलोनी में रहने चला गया जहाँ कोई उसे जानता न था. अधिकतर वह दौरे पर जाता और प्रोजेक्ट को पूरा करता. एक दिन उसे स्नेह का एक मेसेज मिला जिसमे लिखा था. आप बेटी के पिता बन गए हैं. मैंने उसका नाम रौशनी रखा है. रोशन ने फ़ोन नंबर बदल दिया ताकि अतीत के साए उसका पीछा न कर सकें.
तो पढ़ रहें हैं आप मेरी यानी कोमल की लिखी कहानी someone unexpected. अगर आपको किरदारों के साथ जुड़ाव महसूस हो रहा है तो चलते रहिये मेरे साथ कहानी के इस सफ़र पर जहाँ मई फिर मिलूंगी तीसरे और अंतिम भाग के साथ.
[4/22, 18:18] Komal Agrawal: Someone unexpected – Part 3
प्रिय पाठकों , एक बार फिर मैं कोमल काव्या आपके समक्ष प्रस्तुत हूँ और लायीं हूँ अपनी लिखी कहानी someone unexpected का तीसरा और अंतिम भाग. आशा है की आपने पिछले दो भागों को अवश्य पढ़ा होगा. पढ़ने के लिए बहुत बहुत आभार.अब तक आपने पढ़ा की रोशन वर्षों से बिछड़ गयी पत्नी और बेटी से मिलने को व्याकुल है और वह उनसे मिलकर क्षमा माँगना चाहता है क्यूंकि कई वर्षों पूर्व उसने पत्नी के साथ बहुत अन्याय किया था. अब आगे.
जिस पल बस गाँव के बस अड्डे पर रुकी पौ फटने को थी. अन्धकार और प्रकाश की मिली जुली आभा वातावरण को और सुरम्य बना रही थी. किसी तरह पैदल रास्ता खोजते पूछते वह जा पहुंचा है उस दरवाजे पर जो शायद एक बार खुलकर उसकी तरफ हमेशा के लिए बंद हो जाने वाला था. उसने एक बार फिर वाहेगुरु का स्मरण किया और धीरे से कुण्डी खटखटाई मानों उसे दरवाजा खुल जाने का भय हो. जो भी हो आज उसे स्नेह का सामना करना ही होगा आज नहीं तो फिर कभी नहीं. अबकी उसने जोर से कुण्डी खटखटायी और सांस रोके प्रतिक्षा करने लगा. न जाने इतनी सुबह कौन आ गया बुदबुदाती हुई स्नेह दरवाजे के पास आकर ठिठक गयी. वह डर गयी की कहीं फिर जोर से दस्तक हो और रौशनी की नींद न खुल जाए. इधर रोशन सोच में डूबा थर थर कांप रहा था, क्या स्नेह यहाँ नहीं रहती? उसने फिर आशंकित हो कुण्डी खटखटायी. एकाएक स्नेह ने उस दस्तक को पहचान कर दिल थाम लिया. कौन है? पति की अस्फुट आवाज उसके कानों में गरम शीशे की तरह पिघलने लगी. वही तुम्हारा someone unexpected.इस बार एक बिजली कड़क कर कहीं दूर गिरी थी. उसने आतंक से सीने पर हाथ धर लिया. पहली बार उसे पति से भय मालूम हुआ था. सिर्फ एक बार दरवाजा खोल दो , वह तड़प कर बोला. स्नेह ने वाहे गुरु का स्मरण किया , और कुण्डी खोल दी. अन्दर का नजारा उपस्थित हुआ. आँगन में लगे अमरुद की पत्तियां और शाखें ठीक स्नेह के देह की तरह काँप रही थी. अभी दोनों के बीच कुछ संवाद होने भी न पाया था की अपने लम्बे घने केशों को बांधती एक युवती बगल के कमरे से निकली. कौन है दीदी ? बिहारी काका हैं क्या? युवती का नाम रानी था और वह गाँव के कॉलेज में लेक्चरर थी जिसे स्नेह ने बतौर किरायेदार अपने साथ रख लिया था ताकि वह बेफिक्री से इतने बड़े मकान में रह सके और फिर अस्पताल जाने पर रौशनी को सँभालने वाला भी तो कोई चाहिए था. अचानक उन दोनों का सम्मोहन भंग हुआ. रोशन बुरी तरह जमीन में गड़ गया. ऐसी सभ्य युवती के सामने उसका क्या परिचय दिया जाएगा ये सोचकर वह अन्दर ही अन्दर अपमानित होने के लिए खुद को तैयार करने लगा. पत्नी को उसने सदा संदेह की दृष्टि से ही देखा था मगर शक की दिवार गिराते हुए स्नेह सहज स्वर में बोली, रौशनी के पापा हैं. तुम जाकर सो जाओ. परेशान होने जैसी कोई बात नहीं. युवती ने रोशन को खा जाने वाली निगाहों से घुरा फिर कुछ बुदबुदाते हुए अपने कमरे में वापस लौट गयी. रानी सिर्फ स्नेह की किरायेदार न थी बल्कि पिछले एक वर्ष में उसकी और स्नेह की गहरी दोस्ती हो गयी थी. दोनों एक साथ होती तो ऐसा लगता मानों सगी बहनें हो और किसी जन्म का कर्ज उतारने ही मिली हों. रानी ने जब गुस्से में कमरे का दरवाजा बंद किया तो रोशन और अधिक अपराधबोध से भर उठा. उसे उम्मीद भी न थी की स्नेह इस तरह सहज हो किसी को उसका ऐसा परिचय भी दे सकती है. वह खुद को धिक्कारने लगा. इधर स्नेह ने बैठक में रोशन के लिए एक तिपाई बिछा दी और पानी का गिलास भरकर मेज पर रख दिया. फिर सांकल चढाकर अपने कमरे में निशब्द चली गयी. नींद के पालने में झूलती लाडली बिटिया के पास बैठकर वो उसका माथा सहलाने लगी. आज क्यूँ उसका मन इतना वाचाल हो चला था. आज इतने वर्षों बाद पति को सामने पाकर उसके एकाकी मन की व्याकुलता और जोर मारने लगी. रौशनी के जागने पर नवागंतुक का क्या परिचय देगी , यही प्रश्न हवा में बुलबुले की भाँती उठता फिर विलीन हो जाता. और रोशन , उसने भी तो रौशनी के पापा कहे जाने पर कोई विरोध प्रकट नहीं किया. इन बीते चार वर्षों ने उसे बेहद कठोर बना दिया था एवं बहुत शांत. थोड़ी देर बाद वह उठी और घर के काम करने में जुट गयी तब तक रोशन खुद ही उठकर नित्य कर्म से निवृत्त हो चूका था. स्नेह की चुप्पी ने उसे आश्वस्त किया था. वह ख़ामोशी से पत्नी को गृह कार्य करते नाश्ता परोसते देखता रहा. रानी आने दैनिक कार्यों को ख़त्म कर स्कूटी उठा कॉलेज के लिए निकल गयी तो रोशन ने राहत महसूस की. स्नेह को इन चार वर्षों ने बेहद कठोर बना डाला था पर क्या वह उस मोम की तरह नहीं थी जो सर्दियों में ऐसा जमता की फिर निकलने का नाम ही नहीं लेता और जरा सी उष्मा पाते ही पिघल उठता. नन्ही रौशनी को गोद में लिए रोशन उसे खुद बच्चा सा लग रहा था जिसे देख उसकी आँखें रह रह कर भीग जाती. कितने सपने देखे थे दोनों ने मिलकर, नहीं वो कभी रोशन को क्षमा नहीं करेगी. उसकी आँखों के आगे परिवार और समाज की भर्त्सना सजीव हो उठी.अवसर पाकर रोशन ने ही दोनों के बीच का मौन भंग किया , सहारनपुर गया था वहीँ से यहाँ का पता मिला. स्नेह चुप रही क्या इतने वर्षों की जुदाई ने रोशन को लौटने पर मजबूर किया है मगर नहीं जरूर कोई और बात है. इसी बात से तो वह पति से अक्सर नाराज हो जाया करती थी क्यूंकि उसे हर बात में तर्क खोजने की आदत थी और मन वो तो तर्कहीन होता है. बातों का छोर पकड़कर वह कहता ही चला गया कैसे उस पत्र का मिलना फिर उसका भटकना और भाभी के साथ संवाद, मिलिंद और उसकी मंगेतर आकस्मिक मिलने की घटना , सब कुछ तो कह सुनाया उसने. वह घायल सर्पिनी की तरह चीत्कार कर उठी , अगर मिलिंद से मुलाकात न होती तो रोशन को अपने किये का भान भी न होता, प्रेम में क्या सबूत मांगे जाते हैं? वह सीता नहीं जिसे हर वक़्त अग्नि परीक्षा देनी पड़े. अपमान का घूँट पीकर कैसे उसने दो बरस काटे थे शहर में फिर सब के तानो से बचती भागती गाँव में आकर शरण ली उसने. सब वृत्तान्त सुनाती वह पति को धिक्कारती जाती थी और आँचल से आंसू पोंछती जाती थी. चाहती तो तलाक लेकर नया संसार बसा सकती थी मगर मुझे ये कदापि मंजूर नहीं था की एक बगिया का पौधा उखाड़कर दुसरे बाग़ में लगा दिया जाए. वह दृढ़ता से बोली, अब यहाँ कोई नहीं जिसे तुम्हारा इन्तजार हो, हम माँ बेटी अपनी दुनिया में खुश हैं. रानी कॉलेज से वापस आ गयी थी. स्नेह के चेहरे पर बने आंसुओं के निशान ने उसे सब कुछ समझा दिया. रौशनी पड़ोश में खेलने चली गयी और स्नेह अपने अँधेरे कमरे में मूंह लपेटे पड़ी रही. रोज उसकी दो बजे अस्पताल की ड्यूटी होती थी मगर आज वो ना जा सकी. रानी ने सांध्य वंदन किया और जैसे तैसे स्नेह को मनाकर कुछ खिलाया. रौशनी पापा से मिलकर माँ को भूल सी गयी थी जिससे स्नेह की चिंता और बढती जा रही थी. इधर रानी ने ही रात के भोजन की व्यवस्था की और बड़ी सहृदयता से रोशन को परोसने लगी. वह देख रही थी की किस तरह रोशन अपराधबोध की भावना से वूरी तरह ग्रस्त है. उसने रोशन से अपने सुबह के व्यवहार पर शरमिन्दगी जताई और थाली उठाते हुए बोली, आप उम्मीद का दिया जलाये रखें , दीदी आपको बहुत चाहती हैं तभी तो दूसरा विवाह नहीं किया. अगर ऐसा न होता तो अभी तक अआप्को घर से निकाल चुकी होती. वह रोशन को तसल्ली तो दे रही थी मगर वो ये भी जानती थी की स्नेह मजबूत इरादों वाली स्त्री है, वह क्यूँ बार बार ठुकराई और अपनाई जाए. आखिर ये उसके स्वाभिमान का प्रश्न था इधर स्नेह सोच रही थी की कहीं फिर एक दूसरा पत्र उसके पति के विश्वास को चुनौती तो नहीं दे डालेगा? नहीं , इस बार वो नहीं पिघलेगी और न ही रोशन की उपस्थिति को स्वयं और रौशनी के जीवन में स्वीकार करेगी. वह सबल है स्वयाम्सिध्हा है उसे पुरुष के साहचर्य की आवश्यकता नहीं.
रात आँखों आँखों में का कट गयी उसे पता ही न चला , बैठक में निद्रा विहीन पति से कुछ क़दमों का फासला उसे भीतर ही भीतर कचोट रहा था. पूरी रात रोशन विवाह के बाद स्नेह के साथ बीती हुए अन्तरंग लम्हों को याद करता हुआ करवटें बदलता रहा. स्नेह की नाजुक देह का स्पर्श उसकी निर्मल हंसी और उसका अगाध प्रेम उसके ह्रदय का बाँध तोड़ने को व्याकुल था. न जाने कब पंछी कलरव करने लगे और कब आँगन के अमरुद की शाखाएं चंचल पवन की छेड़खानी से थरथराने लगी तब जाकर स्नेह के विचारों की तन्द्रा टूटी. किसी तरह उसने स्वयं को संयत किया फिर रसोई में जाकर चाय बनाने का प्रबंध करने लगी तभी उसे किसी के कदमो की आहात सुनाई दी. उसने पलटकर देका. वह ठीक दरवाजे के किनारे खड़ा जैसे कोई प्रणय निवेदन कर रहा था. स्नेह ने आँखे फेर ली और चाय बनाने में व्यस्त हो गयी. रोशन चुपचाप बैठक में आकर सोफे पर टिक गया , उसने एक डायरी निकाली और उस पर कुछ लिखने लगा. रोज की तरह रानी रौशनी को टाटा काह कॉलेज के लिए निकल गयी और फिर रोशन ने दोपहर तक पत्नी को सुचना दे दी की वह आज चार बजे की बस से चला जाएगा. घर में सन्नाटा सा पसर गया. वह बिटिया को खिलौनों से बहलाता रहा, जिन्न पारी खरगोश जाने कितनी कहानियां उसने सुना डाली पर स्वयं को बहला ना सका.रह रह कर उसकी आँखें भीग जाती , एक ही गीत उसके कानों में बार बार गूंज रहा था, ज़िन्दगी के सफ़र में बिछड़ जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते. स्नेह घर के कामों में मशीन की तरह जुटी थी. रोशन के लगभग सभी कपडे उसने धोकर छत पर सुखा दिए थे और अब उन पार इस्तरी चला रही थी. कॉलेज से लौटी रानी ने जब अपने एकमात्र जीजाजी का बैग पैक करते स्नेह को देखा तो उसका ह्रदय द्रवित हो उठा. स्नेह के चेहरे पर सख्ती का भाव देख वह उससे कुछ न कह सकी पर रोशन के पास जा पहुंची और बोली, क्या आज ही चले जायेंगे? उसने कभी किसी पुरुष को रोते न देखा था , आंसू पोंछते हुए रोशन बोला , चार बजे शायद कोई बस जाती है उसी में चला जाऊँगा. रानी ने रोशन का हाथ थाम लिया , आप किसी भी तरह दीदी को समझाएं , आखिर वह आज भी आपकी पत्नी है. रोशन खामोश रहा. रानी अपने कमरे में जाकर लेटी रही. तभी स्नेह ने आकर कहा, मुझे अस्पताल जाना पड़ेगा, फ़ोन आया है, तुम रौशनी का ध्यान रखना . मैं ६ बजे तक लौट आउंगी. और उनका क्या होगा जो बैठक में बिन बुलाये मेहमान की तरह पड़े हैं, सहसा रानी ने तड़प कर क्रोध से पूछा. उनकी चार बजे की बस है , वो आज ही चले जायेंगे , स्नेह शांत स्वर में बोली. एक बार फिर सोच लो दीदी, वो अपने किये पर पछता रहें हैं, एक गुनाह जो उनसे अनजाने में हुआ , उसकी इतनी बड़ी सजा नहीं होनी चाहिए, रानी ने प्रार्थना की. और जो सजा मैंने भुगती है उसका क्या? स्नेह ने नारीवाद की पक्षधर रानी से सीधे सवाल किया.. पर कोई जवाब न पाकर वह तेज क़दमों से बाहर निकल गयी. निर्णय हो चूका था. रानी ने मन ही मन इश्वर से प्रार्थना की. स्नेह पैदल अस्पताल के लिए निकल गयी यद्यपि रानी के पास स्कूटी थी मगर वह उसका व्यवहार कम ही किया करती थी. आज हवा में जरा ज्यादा नमी थी. चार बजने से पहले ही तेज आंधी चलने लगी और आंगन में पड़ी चीजों को जैसे उलट पुलट कर रख दिया. धुल कमरों में प्रवेश करने लगी तो रानी ने सारे दरवाजो और खिडकियों को ठीक से बंद किया फिर अपने जीजाजी के पास आ बैठी. इतने खराब मौसम में आपको बस कहाँ मिलेगी , भगवान् भी नहीं चाहता की आप हम लोगो को छोड़ कर जाएँ. रोशन का अस्वस्थ मन रानी की सहृदयता से विभोर हो उठा , मैं जब भी आपको और दीदी को देखती हूँ तो मुझे एक भरे पुरे परिवार की हंसी याद आती है जो कभी मेरा था. रोशन ने व्यग्र होकर पूछा , तुम्हारा? फिर कहाँ हैं तुम्हारे घर वाले? वह और भी कितने प्रश्न पूछना चाह रहा था पर रानी ने खुद ही कहना शुरू किया. आज से ढाई वर्ष पहले मैंने घर से भागकर देव के साथ प्रेम विवाह किया था. हम दोनों एक साथ यूनिवर्सिटी में थे लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. उसने प्रेम विवाह मेरे साथ किया मगर उसका कोई प्रमाण न था. उसके जीवन में और भी लड़कियां थी जिसका पता मुझे बहुत देर से चला और जब चला तो मै इस बात को स्वीकार न कर सकी और उससे तलाक लेकर बहुत दूर चली आई. दीदी न होती तो मुझे सहारा भी न मिलता. कहकर वह आँखें पोंछने लगी. आप भी चले जायंगे तो यह घर सुनसान हो जाएगा. तभी रौशनी मचल उठी. पापा , आप कहाँ जाओगे ? पापा कहना भी रानी ने उसे सिखाया था. रोशन अस्फुट स्वर में बोल पड़ा, नहीं, अपनी बिटिया को छोड़कर कहीं नहीं जाउंगा , उसने एक कठोर निर्णय लेने का निश्चय किया और बेटी के मोह ने उसे एक बिंदु पर पहुंचा दिया. बेटी को पाने के लिए अगर उसे स्नेह से लड़ना भी पड़े तो वह लड़ेगा. इधर अस्पताल में स्नेह का मन बहुत बेचैन था, उसका मन अशांत पाकर जब डॉक्टर सावित्री ने इसका कारण पूछा तो स्नेह ने तबियत खराब होने की बात कही. चली जाओ , मौसम बिगड़ रहा है शायद झमाझम वर्षा होगी. वो अनुमति पा तुरंत घर के लिए निकल पड़ी. चंद कदम ही चली थी की बारिश की बड़ी बड़ी बुँदे तेज हवा के साथ उसे भिगोने लगी. जैसे तैसे वह सर पर आँचल लपेट वर्षा में भीगती घर में प्रविष्ट हुई. उसे उम्मीद थी की रोशन नहीं गया होगा. क्या उसके न रोकने पर वो चला जायेगा? ये मन भी कितना बावरा होता है. बाहर से स्वयं को सख्त दिखाने की चेष्टा करता है पर अन्दर से किसी बच्चे की तरह डरपोक. पर ये क्या? बैठक सुनी पड़ी थी ना ही रोशन था ना ही रानी कहीं दिखाई दे रहे थे. उसका अधीर मन हाहाकार कर उठा , चले गए न आखिर, सब पुरुष एक जैसे होते हैं. उन्हें सिर्फ अपने दर्द का ख्याल होता है. किसी दुसरे का ठुकराया कैसे बर्दाश्त करेंगे. वह रानी के कमरे तक गयी तभी रानी भी आहट पा बाहर निकल आई. अरे, आप तो बिलकुल भीग गयी , रास्ते में कहीं रुक जातीं. उसने बड़े अपनत्व से कहा. उसके साथ रौशनी को न देख स्नेह का मन विचलित हो उठा. वह तेजी से कमरे में घुसी. पर रौशनी कहीं नहीं थी. स्नेह को इस तरह बौखलाया देख रानी जल्दी से बोल पड़ी, जीजाजी उसे ले गए हैं. स्नहे जैसे आसमान से गिरी, गरज कर बोली, वो उसे क्यूँ ले जायेंगे? तुम होश में तो हो/ वह पागलों की तरह बाहर भागी. दीदी, सुनो तो सही, कहते हुए रानी उसके पीछे दौड़ी मगर बादलों की गर्जना और वर्षा की तेज आवाज के बीच उसकी आवाज कहीं दब कर रह गयी. स्नेह दौड़ती हुई बस अड्डे की तरफ लपकी. रानी उसे जाते हुए देखती रही. रास्ते पर लम्बे लम्बे डग भरती हुई स्नेह आगे चली ही जा रही थी की उसने एक दूकान से निकलते रोशन को देखा. उसकी गोद में रौशनी को देख वह उसी तरफ झपटी. एक झटके में उसने रौशनी को उसके पिता की बाहों से अलग कर सीने से चिपटा लिया. बच्ची माँ के इस अप्रत्याशित व्यवहार पर छटपटाने लगी और पिता के पास जाने को मचल उठी. अब स्नेह के क्रोध का पारावार न था, तो यह षड़यंत्र रचा था , इसे भी मुझसे छीन लेना चाहते हो ताकि मैं जीते जी मर जाऊं. किस जन्म का बदला ले रहे हो मुझसे? वह वापस जाने को पलटी लेकिन सहसा पति ने उसका हाथ थाम लिया ठीक वैसे जैसे उसने ठीक फेरे लेने से पहले थामा था. आज कोई भी बस नहीं मिली इसलिए घर वापस लौट गया था पर वहां जाकर देखा की रौशनी झूले से गिरकर रो रही है तो रानी से अनुमति ले इसे खिलौने दिलाने ले आया. माँ की गोद में रौशनी एक भालू से खेल रही थी. रौशनी तुम्हारी है हमेशा तुम्हारी ही रहेगी. चलो तुम्हे घर पहुंचा दूं उसने अभी भी स्नेह का हाथ थामा हुआ था. स्नेह ने इधर उधर देखा , दो लोग उनकी तरफ ही ताक रहे थे. उसने हाथ छुड़ा लिया और चलने लगी. अपने मौन से उसने पति को भी साथ चलने की स्वीकृति दे दी. दोनों साथ चलने लगे. सहसा वह घर की तरफ जाने वाली एक कच्ची पगडण्डी पर उतर गयी. अब वह आगे चल रही थी और रोशन उसके पीछे हाथ में खिलौनों से भरा बैग पकडे किसी अनजान डगर पर चला जा रहा था. एकाएक स्नेह मुड़ी. उसने पति की बाहों में रौशनी को सौंप दिया. उसकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली , जब से आपने मुझे ठुकराया था तभी मैंने प्रण किया था की एक दिन आपसे कहलवा कर रहूंगी की ये आप ही का रक्त है आपका अपना अंश. अब तो मेरी मन्नत पूरी करेंगे न? उसने पति का हाथ कस कर थाम लिया. रोशन रुंधे स्वर में बोला, मेरी मन्नत तो तुम हो और ये तोहफा जो तुमने मुझे दिया है ये उस मन्नत का प्रसाद. आसमान बरसकर और उजला होने लगा और पंछी चहचहाते हुए अपने घोंसलों में लौट रहे थे और लौट रहा था एक जोड़ा अपने नूतन संसार में जहाँ रानी उनकी प्रतिक्षा में दरवाजे पर आस लगाये खड़ी थी.
तो पाठकों , कैसी लगी ये प्रेम कहानी , जरूर बताएं. मैं कोमल काव्या फिर मिलूंगी आपसे इस कभी न ख़त्म होने वाले सफ़र में और कहानियों के साथ. आभार सहित- लेखिका-कोमल काव्या.

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