जगत जननी माँ दुर्गा

जगत जननी माँ दुर्गा
हे जगत जननी, शक्ति स्वरूपिणी,
त्रिभुवन तारिणी, मंगला महाशक्ति।
तेरी महिमा अनंत, अपार,
तू ही सृजन, तू ही संहार।
शेर वाहिनी, रणचंडी भवानी,
दुष्टों की संहारिणी, महा कल्याणी।
सत्य धर्म की रक्षक माँ,
अधर्म संहार कर, करे कल्याण।
करुणा की मूर्ति, दया की खान,
तेरी कृपा से मिटते अज्ञान।
शरण तिहारी जो नर आवे,
कष्ट सभी उसके मिट जावे।
कभी अन्नपूर्णा, कभी काली,
कभी गौरी, कभी महाकाली।
तेरे रूप हैं अनगिनत माता,
हर रूप में करुणा विधाता।
नवदुर्गा के रूप निराले,
हरते संताप, मिटाते जंजाल।
जो सुमिरन तेरा दिन-राती,
उसकी नैया लगे किनारी।
हे माँ! तुझसे विनय हमारी,
रखना सदा कृपा की धारा।
तेरे चरणों में शीश नवाएँ,
पाएँ भवसागर से किनारा।
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”