सच की माला फेरते

दोहा
सच की माला फेरते, करते सच की बात।
खंजर घोपें पीठ में, दे कर सच को मात।।
साच-साच रटना रटें, रहते सच से दूर।
लम्बी-लम्बी हांकते, रहे साच को घूर।।
झूठ रचाया गजब का, झुठला देगा कौन।
लीप पौत तैयार कर, किन्हे सारे मौन।।
चकाचौंध में झूठ है, करती देखो राज।
डांट-डपट सच को मिले, ठोकर खाए लाज।।
साच उदासी में खड़ी, झूठ रही है नाच।
सच साबित करना पड़े, बैठी देखो जांच।।
सच सुनकर सब भागते, खूब जताएं रोष।
ऐब छिपा कर आपणे, देते सच को दोष।।
सिल्ला सच कड़वा लगे, सुनकर जाते रूठ।
बोलण में मीठा लगे, सुने सभी नित झूठ।।
-विनोद सिल्ला