पिताजी की याद

पिता की छाँव थी जो सिर पर,
वो साया अब नहीं रहा,
जो थाम लेते थे हर संकट में,
वो हाथ अब नहीं रहा।
नजरें ढूँढें हर कोने में,
वो मुस्कान नहीं दिखती,
मन के आँगन में गूँज रही,
बस उनकी प्यारी बातें बिखरी।
सिखाई थी जो राह हमें,
संघर्षों से ना डरने की,
अब भी चल रहे हैं हम,
उनकी दी हुई रोशनी में।
आशीर्वाद बनकर संग हैं वो,
हर साँस में बसे हुए,
यादों की चादर लिपटी है,
मन के हर एक कोने में।
अनोप भाम्बु
जोधपुर