इत्मीनान रखो

मुझको न तुम पसंद करो,
ये खेल नहीं है जीवन मेरा,
बिकने वाली न ही गुड़िया हूँ,
न ही बाजार खुला यहाँ ।
घर मेरा ये,
जहाँ पाली बढ़ी हुई,
थोड़ी सी जब हुई बड़ी हूँ,
दुनिया में भागीदारी हूँ।
ग्राहक बन मत आओ यहाँ,
घेर मुझे न डराओ यहाँ,
ब्याह के बहाने न सताओ मुझे,
भोग विलास की कोई वस्तु नहीं हूँ।
ठुकरा देते तुम और मैं लड़ती रही,
क्या मैं एक लड़की नहीं ?
मानव की बच्ची नहीं,
इतनी सस्ती है क्या आबरू ।
लड़के हो तो करोगे गुरूर,
समझ लेना मेरी बात जरूर,
ठेस मन को न देना,
अपमान हमारा न करना।
सम्मान बचा कर हम रखते है,
प्यार जताना हम भी चाहते है,
तुम्हे अपनाना भी चाहते है,
इत्मीनान रखना तुम भी सीखों।
रचनाकार
बुद्ध प्रकाश
मौदहा हमीरपुर।