*” महा कुंभ की ओर चलें”*

” महा कुंभ की ओर चलें”
आस्था श्रद्धा भक्ति अटूट विश्वास,
सत्य सनातन ,संस्कृति विरासत में मिली हुई है।
धर्म युद्ध, कर्म युद्ध, द्वंद युद्ध, ये कैसा महाकुंभ महायुद्ध है।
करोड़ो जनता, जन मानस की भीड़ सैलाब कुंभ स्नान करने बढ़ चली है।
गंगा नदी का तेज प्रवाह ,पाप दूर करने, मोक्ष दिलाने, सुकून शांति दे रही है।
ना जाने क्यों कोई चिंता फ़िकर नहीं, कोई दूरी की परवाह नहीं है।
बस ये आस लिए जिद्द जुनून मे महाकुंभ की ओर बढ़ते हुए चले जा रहे हैं।
जीवन धन्य बना निर्मल पवित्र आनंद मना कर, उद्देश्य पूरा कर पुण्य कमा रहे हैं।
तमन्ना यही है भीड़ भाड़ में जाके,पैदल यात्रा, बिना रुके हुए चल रहे हैं।
एक दूसरे का देखादेखी कर, बस थैला उठाए संगम पे चल पड़े हैं।
अंर्तमन में आस्था रख ,श्रद्धा भक्ति लिए, उम्मीद का दीप जला रखें है।
हथेलियों में गंगाजल ले, सूर्य अराधना,सबके नाम की डुबकी लगाते हैं।
महाकुंभ में डुबकी लगाते, नारियल सिक्का भेंट चढ़ाते, आत्म शुद्धी पुण्य कमाते चलें हैं।
महाकुंभ से डुबकी लगा जो भी आते,
चेहरे पे प्रसन्न चित्त खुद को भुला थकान मिटा खुशियाँ लुटा बैठे हैं।
चलो सभी महाकुंभ की ओर,गंगा मइया की जयकार जय घोष लगाते हैं।
आत्म शुद्धी चिंतन मनन कर,खुशी खुशी घर को लौट चलें हैं।
शशि कला व्यास शिल्पी