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5 Jan 2021 · 1 min read

“माँ का बुना स्वेटर”

सहेज रक्खा है, माँ का बुना स्वेटर वो, आज तक,
रखी महफ़ूज़ हैं, यादें भी उनकी इसमेँ, आज तक।

भले ही धूप गुनगुनी, या अँगीठी की आँच रू,
नहीं परवाह, भूख-प्यास की, ख़ुद की गई थी छू।

जतन से डालना फन्दों का, बिना नाप लिए यूँ,
गज़ब थी, उनकी महारत, जो आता फ़िट था चार सूँ।

नहीं है ये फ़क़त स्वेटर, ये तो माँ का दुलार है,
जिसे नौ माह रखा गर्भ मेँ, ये उसपे प्यार है।

लगे न ठँड, सलोने को, यही आरज़ू रही,
बला न पास भी फटके, वो यूँ थी रूबरू रही।

दुआ है उसकी कारगर, जो सलामत हूँ आज तक,
यही “आशा”, कि इबादत मिरी, पहुंचे मुक़ाम तक..!

महफ़ूज़ # सुरक्षित,safe
रू # सामने,in front
सूँ # तरफ़, direction

——//——//——//——//——//——//——

रचयिता-

Dr.asha kumar rastogi
M.D.(Medicine),DTCD
Ex.Senior Consultant Physician,district hospital, Moradabad.
Presently working as Consultant Physician and Cardiologist,sri Dwarika hospital,near sbi Muhamdi,dist Lakhimpur kheri U.P. 262804 M.9415559964

Language: Hindi
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Books from Dr. Asha Kumar Rastogi M.D.(Medicine),DTCD
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