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भटनी शहर में ना

विधा-कजरी

तू त चलि गइलऽ भटनी शहर में।
राति के पहर में ना।
हमके छोडि के किराया के घर में,
ठीक दुपहर में ना।

कहत रहलऽ करब केयर, छोडि के जालऽ स्पेयर।
हमारो जिनगी घोराइल जहर में, राति के पहर में ना।

घंटा देखे सब बहत्तर, जिनगी भइल बद से बद्तर।
इहवाँ राशन ना पानी बा घर में, ठीक दुपहर में ना।

रेलिया भइलि सवतिन, मिले ना दे तीन दिन।
हमके छोडि देतऽ संईया नइहर में, ठीक दोपहर में ना

सन्तोष कुमार विश्वकर्मा ‘सूर्य’

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