1. मैं कैसे भुला दूँ !
गुज़रे दिनों का वो ज़माना मैं कैसे भुला दूँ ।
ज़िन्दगी का अहम् फ़साना मैं कैसे भुला दूँ ।।
तेरा वो चहकना, फूलों सा हरपल महकना ।
यूँ मेरे दिल में तेरा उतरना मैं कैसे भुला दूँ ।।
तरसता था हर पल जो वास्ते दीदार के तेरे ।
हुस्न-ए-रुख़सार निहारना मैं कैसे भुला दूँ ।।
होती थी जिस से मेरी हर सुबह जो रौशन ।
फूलों सा तेरा वो मुस्कुराना मैं कैसे भुला दूँ ।।
तेरी बातों के जादू ने किया मुझे बेकाबू ऐसा ।
तेरी कोयल सा वो कू-कूहाना मैं कैसे भुला दूँ ।।
घटा बन के जो छा जाती मेरे वादी-ए-सूरत पे ।
इतराती ज़ुल्फ़ों का वो नज़राना मैं कैसे भुला दूँ ।।
कसमें खायी थी साथ निभाने का तू ने उम्र भर ।
इस वादे से तेरा यूँ मुकर जाना मैं कैसे भुला दूँ ।।
तू ने मरहम भी लगाया तो काँटों के नोक से ।
मेरे ज़ख्मों का ऐसा इलाज़ मैं कैसे भुला दूँ ।।
मो• एहतेशाम अहमद,
अण्डाल, पश्चिम बंगाल, इंडिया