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Oct 21, 2021 · 1 min read

ग़रीब (मार्मिक कविता)

हम छी गरीब
नहि आब दैत छथि
हमरा कियो अपना करीब
किएक त हम छी गरीब।।

भरि दिन भूखले रहि केँ
किछु काज राज करैत छी
मुदा तइयो दू टा रोटी
लिखल नहिं अछि हमरा नसीब।।

जेकरे मौका भेटैत छन्हि
वैह हमर शोषण करैत अछि
किछु बाजब त बोइनो नहि भेटत
डरे हम किछु नहि बजैत छी।।

डेग डेग पर भ्रष्टाचार
एसगर हम केकरा सँ लड़ब
धिया पूता अन्न बिनू बिलैख रहल अछि
कहू कोना के हम जिअब।।

ठिकेदारो हमरे कमाई लूटि रहल अछि
जेबी मे नहि अछि एक्को टा टाका
नून रोटी खा कहूना के रहि जइतहुँ
मुदा बढ़ल मँहगाई गरीबक घर देलक डाका।।

टाकाक अभाव मे आब हम
बनि गेलहुँ अस्पतालक मरीज
डॉक्टरो हमरा देखी कहैत छथि
तू दूरे रह नहि आ हमरा करीब।।

विधाता केहेन रचना केलैन
जे हमरा बनौलन्हि गरीब
नहि आब दैति छथि
हमरा कियो अपना करीब।।

आब अहिं कहू यौ समाजक लोक
अधपेटे कोनो जीबैत छी हम
गरीबिक दुशचक्र अछि घेरेने
जिनगी जीबाक आस भेल आब कम।।

जी तोड़ मेहनत करैए चाहैत छी
मुदा कतए भेटत सब दिन काज
काज भेटलो पर होइत अछि शोषण
एना मे कोना करब धीया पूताक पालन पोषण।।

साँझ भिंसर दू टा रोटी भेटैए
एतबाक आस लगेने अछि गरीब
निक निकौत सेहन्तो नहि सोचैत छी
किएक त हम छी गरीब।।

कवि:- किशन कारीगर
(©काॅपीराईट)

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