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5 Oct 2022 · 3 min read

💥प्रेम की राह पर-69💥

ईश्वर साक्षी है।तुमसे कभी कोई फूहड़ संवाद किया हो।तो कहो।हमें तो लिखने भर से मतलब है।परन्तु इस नैराश्य का सहसा जन्म लेना बहुत जानलेवा है।अल्लमा इकबाल की शेर-माना कि तेरी दीद क़ाबिल नहीं हूँ मैं। तू मेरा शौक़ देख इंतिज़ार देख।।कोई बानगी नहीं किसी भी तरह की।जिससे उत्साहवर्द्धन होता।अब तो यही होगा-“उगलत निगलत पीर घनेरी, भई गति साँप छछूँदर केरी” और तुम इसी के योग्य हो और शायद मैं भी।नमूने कैसे लग रहे हैं।अभी दर्द का त्वरण और बढ़ाया जाएगा।जमकर बैठ जाना सीख लो।तुम्हें लगा कि यह कबूतर ख़ूब फँसा।तो सुनो अब तुम्हें उछाले जाने में बहुत आनन्द आएगा।यह दृश्य बहुत रमणीक होगा और प्रशंसा के योग्य भी।कोई तिकड़म भी देखी थी मेरी ओर से।तो बताओ वह कौन सी थी।कोई थी ही नहीं।नाबालिगों के चक्कर में उनके ही वचनों को महत्व दिया गया।फँसो जाओ।हमें क्या मतलब है?पर तुमने जो निर्णय लिया न तो ध्यान दिया मेरी दीद का और न ही शौक़ का।हाँ कोई अच्छा व्यापारी अथवा परम शिक्षित अध्यापक मिल गया।देखूँगा रूपा से कौन सा रूपकिशोर मिलेगा।चलो।आदमी यह समझता है कि संस्कृत पढ़ रहें हैं तो लल्लू होंगे।पूरा तिलिश्म अब शुरू होगा।सभी इल्मों की हल्की हल्की-हल्की बानगी तुम्हारे लिए बहुत है।मज़ा तो तब आएगा जब सिली सिली हवा औंदेगी।सब नूर-ए-करिश्मा ग़ायब हो जायेंगे।रहेगी तो तुम्हारे अवगुणों की बू।तुम मलिन हो और इतनी कि अब उनके सन्देश आ रहे हैं।कोई वैचारिक उद्बोधन दिया जा सकता था।कोई नहीं।वंचकपन से परिचय जो कराना था।यह काफ़िया काफी समय से लग रहा होगा।अब मेरा द्विजत्व देखो।जिसकी आग तुम्हें मन्द गति से जलायेगी।इसे अपने आचरण से ही तुमने निमंत्रित किया।अब यह मेरे ही कहने पर बुझेगी और मैं इस विषय के तारतम्य में एकशब्द भी नहीं बोलूँगा।एक मूकदर्शक की तरह तुम्हें जलता देखूँगा।कोई सहयोग भी नहीं मिलेगा।यही तो है सांसारिक प्रेम का अस्त होना।ईश्वरीय प्रेम तो बहुआयामी होता है।उसमें कितना भी बुरा हो तो भी भला ही होगा।मैं जानता हूँ कि यदि तुम्हें ईश्वर बना दिया जाए तो सबसे ज़्यादा दण्ड का हक़दार मैं ही हूँगा।परन्तु तुम्हें कोई ईश्वर नहीं बनाएगा।तुम्हारे कृत्य एकदम लापरवाह हैं।”दीपशिखा सम युवति तन, मनजनि होसि पतंग”तो सुनो न तो तुम दीपशिखा थीं और न ही मेरे मनपतंगे के होश उड़े।मेरा राग तुमने सुना।अपना राग तुम सुना न सकी।बस इतना भर है।क्यों कि किताबी ज्ञान को शिक्षा का व्यापार ही कहा जायेगा।पुरानी किताबों को सस्ते में खरीद कर कुछ विशेष करने की कला बहुत आती है तुम्हें।तो इन फूहड किताबों को पढ़कर कुछ नहीं मिलेगा।सबसे बड़ी बात तो यह कि अपनी मज़ाक तो तुम्हें ख़ूब जँची।दूसरे की मज़ाक का भी मज़ाक उड़ाया जा रहा है।ज़्यादा निर्दोष न बना जाए।अब उसके लिए तैयार हो जाओ।जिसको तुमने पहले भी जिया है।अब तुहार कबूतर से उड़ जईहें।कोई न बचइहें।अब तो झेलो उस दरिद्रता का आश्रय जिसे कोई रूपकिशोर तुम्हें देगा।समझी रूपा।अपनी आदतों को संभाल कर रखना।इनमें अपने घटिया आचरण का पर्दा भी लगा लेना।तुम निरन्तर बुदबुदाती रहोगी और कोई तुरुप का पत्ता बचा है तो उसे भी चला लो।कोई मंजिल बची हो तो उसे भी पूरा कर लो।तुम उस अन्धड़ में फँस चुके हो।जिसमें तुम्हारा उड़ जाना भी निश्चित है।उस मिलने वाले असीम से ससीम हो चुकी।क्या कोई अलग विद्या आती है।तो कहो उसका निर्वचन।कोई उद्योग करना आया।नहीं आया।तो फिर खरी खरी सुनने की आदत भी डालनी होंगी।हमें तो अपनी जिन्दगी काटनी है।वह भी उस ईश्वर की कृपा से कटी है और कट जाएगी।तुम अपनी सोचो।हमें तो लिखने से मतलब है।जैसे संगीत में रियाज़ होता है तो लेखन भी इससे कहाँ वंचित रहने वाला है।यदि आपका मानना यह हो कि मैं अपने जीवन में फूहड़पन शामिल करूँगा,बिल्कुल नहीं।दूषित भोजन शामिल करूँगा।बिल्कुल नहीं।यह सब मिलने पर ही ख़त्म होगा।बिना विचारों के जानने पर कोई प्रगति नहीं होगी।जानो समझो अच्छा लगे तो ठहरो।न तो तुम्हारा कोई परिवर्तन होगा और न मेरा।उचित जान पड़े तो स्वीकार करो नहीं तो चुनो अपना रास्ता।तुम अपने रास्ते हम अपने रास्ते।इसमें क्या घाटा है?नहीं तो समझ लेना।कोई भी विश्वासघातक निर्णय बहुत क्षतिदायक होगा आपके लिए।इसलिए एक-एक कदम सुरक्षित उठाना।देख लेना।खींच लूँगा स्वतः ही तुम्हारे स्थान से।नमूने कैसे मिल रहे हैं।जय श्री राम।
©®अभिषेक पाराशर

Language: Hindi
206 Views
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