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4 Dec 2022 · 6 min read

💐प्रेम की राह पर-75💐

##मणिकर्णिका##
##बौनी कभी समझ न पाई##

क्यों री बौनी रजनी! तेरे राजू ने कौन-कौन से गाने पर डांस किया था।”लगावेलू जब लिपिस्टिक हिलेला सारा डिस्ट्रिक्ट”।यह था क्या?।बौना अमेजन के जंगलों में घुमा रहा होगा।घूम ले।वहीं से सीधी पड़ जाना आर्कटिक पर शोध करने के लिए।ख़ैर आगे बढ़ते हैं, खुफिया ने बताया था कि भैया बौना-मेढ़क उछल-उछल कर डांस कर रहा था,परन्तु बौने का नृत्य व्यंग्य और हास्य से भरा था।बौनी भी हाथ लहरा रही थी।मैंने पूछा कौन से गाने पर।भैया,उसने हँस के कहा,डेढ़ फुटिया नाच रही थी,”झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में”।मैंने पूछा सवा फुटिया लग कैसी रही थी।वह बोला भैया यार गलत बात है।मैंने पूछा क्यों?रे।आप बौनी की लंबाई घटाते जा रहे हो।डेढ़ फुटिया से सवा फुटिया कर दी।मैंने कहा दिल पर मत ले।ढाई फुटिया कह दूँ तो चलेगा।फिर वह बोला।नहीं भैया आपने ज़्यादा बढ़ा दी।इतनी तो बौना बौनी एक दूसरे के ऊपर खड़े हो जाएं तो भी न हो।आए हाए,रूपा कैसी-कैसी नाची।रूपा की भाभी भी।रूपा की भाभी भी ऐसे डांस कर रहीं थी जैसे दाद पर ज़ालिम लोशन लगा रही हों और बौनी का भैया।महा बौना।ग़लत इशारों से डांस कर रहा था।ऐसा लग रहा था कि आँण्डा का तेल लगा रहा हो।मैंने फिर उसे टोका।अरे मूर्ख टॉपिक को बौनी और बौने पर फोकस कर।क्यों तरंगित कर रहे हो माहौल को।बौनी बौने की संगति पहले से ही हो चुकी थी।क़रीब तीन माह पूर्व एक विश्वस्त सूत्र ने जानकारी दी थी कि भैया बौनी तो गई।तो मैनें उसे तुरन्त झाड़ा था।कहा था कि मुझे रूपा में इतनी आसक्ति नहीं है।कि हम अपने ब्रह्मचर्य की तोपें स्वर्ग में पहुँचा रहे हों और काम से इतने भी पीड़ित नहीं हैं कि हर समय रूपा का नाम जपें।रूपा को मैंने हर क्षेत्र में पछाड़ा।रूपा ने कभी सुखद प्रश्नोत्तर नहीं किए।यह बहुत दुःखद था।रूपा मेरे लिए सबूत इकठ्ठे करती रही।पर उसके सबूतों में कोई दम नहीं है।मैसेज कर दिए तो क्या?उससे कौन सा स्पर्श कर लिया रूपा को?रूपा को जब फोन किया था तो रूपा की आवाज से ही पता लग गया था कि यह मयूरी की भाषा ही बोलेगी।तो मध्य समय के अन्तराल में रूपा ने कई जगह बात की विशेषतः प्रयागराज।जैसा कि एक पुलिसमित्र ने बताया।वह यह जानना चाहती थी कि क्या आपने मैसेज किये थे?तो हमने भी कह दिया,स्वीकार करते हुए कि हाँ मैसेज रूपी तोप के गोले तुम्हारे इनबॉक्स में हमने ही छोड़े थे।पर विषधारी नागिन तू फिर भी न मरी।पर हाँ एक बात तुम्हारी जानकारी के लिए बता दें कि जूती हमारे न पड़ के हमारे मित्र के पड़ी थी।उसको उत्साहित करके आगे कर दिया था।तो वह बह गया भावों में और हमारे शब्दो को रूपा तक पहुँचा दिया।फिर तो रूपा ने अपनी शिक्षा की सभी योजनाओं को ऐसे प्रस्तुत किया कि कुछ भी रह न जाए।कितनी शिक्षित थी यह भी पता लग गया।एक दम वाहियात।रूपा को इस सबका परिणाम मिलेगा।यदि रूपा यह चाहती है कि उसे यह परिणाम न मिले।तो वह तीन काम करे 1-भैया कहते हुए फोन करे।2-अपनी भी गलती माने।3-चूँकि रजनी में हमें कोई भी इतनी आशक्ति न थी, तो वह अनावश्यक किसी भी उन्मादी व्यवहार को आगे न बढ़ाये।यह आसक्ति या फिर संस्कार कहें इतना भर था कि या तो रूपा से एक बार मिल लूँ या फिर बात हो जाए।तो रूपा से मिल तो न सका।पर हाँ, बात हो गई।पर बात कोई प्रभावशाली नहीं थी।एक शोधकर्त्री से उच्छिष्ट विचारों के साथ पुनः उन्हीं वार्ताओं का कलेवर देना किसी भी स्तर पर उचित नहीं था।यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि आप भरमा गए थे,तो ऐसा भी नहीं था।कोई नया तथ्य अथवा पहलू सामने आता पुरानी बातों को छोड़कर,अथवा कोई नयापन दिखाई देता।बातों से,ऐसा कुछ भी शिक्षित महिला से सुनने को न मिला।यह तब था जब वह सब जान चुकी थी कि यह व्यक्ति निश्चित ही किसी वैमनस्य अथवा स्त्री शरीर में आसक्ति से प्रेरित नहीं है।तो कुछ ऐसा प्रतीत होता कि मैं भी किसी सांसारिक लफड़े(दुष्चक्र) से उन्माद का शिकार था।वह भी नहीं।इस पुस्तक ‘प्रेम की राह पर’ उस हर दिशा पर,आधार पर,व्यंग्य पर,हास्य पर नवीनता का प्रयास किया गया है।सभी पोस्टों से केवल बहुमूल्य उद्धरणों को लेकर ही इसका कलेवर तय हो जाएगा।हनुमत कृपा से इस पुस्तक में किसी भी पुस्तक का व्यवहार नहीं किया गया। भगवती “श्रीमद्भगवद्गीता” के सुखद आश्रय का सहारा लिया।माता की गोद में सदैव खेलता रहूँ।माता ऐसा ही करें।इस पुस्तक में प्राणी से प्राणी की मनोभाव,चूँकि मैंने किसी स्त्री से कभी ग़लत संवाद नहीं किया (हाँ, रूपा तुम्हारे लिए भी नहीं) तो यह सब कोरोना काल की ही उपज है।सिविल सेवा की उबाऊ तैयारी, के मध्य अपनी लेखन के रियाज़ को किस स्तर तक बनाये रखा जाए।यह ईश्वर से प्रार्थनीय था।कोई गल नी मेनू।किसी लिंग विशेष शरीर को देखने से पूर्व उस शरीर में स्थिर होने वाले मल, मूत्र, मज्जा को भी देखें।तो उस की कालिमा कभी भी हमें आकर्षित न करे।चूँकि मेरा दिमाग़ खुरापाती है,नाबालिग खुरापाती नहीं मतलब,जिस वार्ता में कोई ऐसा विन्यास छिपा हो,जो नवीनता लिए हुए हो,तो किसी न किसी माध्यम से कह ही देता हूँ।फिर वह अपने हिस्से की गालियाँ क्यों न देता रहे।वे देते रहो न,कौन सी लग रही है।परन्तु रूपा ने किसी भी समेकित वार्ता का प्रयास कभी नहीं किया।यह बहुत गलत था।वह इस संवाद को भैया कहकर समाप्त कर सकती थी।पर उसके मन में वास्तविक रूप से पाप छिपा था।वह सोच रही थी कि गज़क को कुटने दो।ज्यादा कुटी तो ज़्यादा मज़ा आएगा।मेरे आशय तब भी निन्दनीय नहीं था।हाँ,मैंने इस आशय से कि यह रूपा पीएचडी कर रही है,तो कहीं न कहीं मेरा सहयोग ही करेगी।पर वह तो विस्तृत घण्टू निकली।कोई किसी भी प्रकार का शरणदायक कथन न कहा।मैंने पहले ही कहा था कि मैं स्त्री में माता,बहिन,बेटी का ही स्वरूप देखता हूँ।किन्चित भी रूपा में इसके विपरीत क्यों देखता?रूपा के विषय में मुझसे सब कुछ मेरे खुफिया ने उसके गाँव से, उसके ही सहपाठी से(ये सब अज्ञात ही रहेंगे) और विभागीय दृष्टिकोण से पता लगा लिया था।फिर ख़्यालों की गिलोल से रूपा के बन्दर जैसे चेहरे पर शब्द रूपी कंचे बरसाता गया।जूती मेरे मित्र के पड़ी थी।वह फिर इस कार्य में लग गया था कि रूपा की सुरागी कैसी मिले।उसने पहले ही बता दिया था कि रूपा बौनी है।फिर उसने अग्रिम अग्रिम सूचना के आधार पर बताया कि रूपा बौने की हो गई।यह पुस्तक जल्दी ही विविध दर्शनों के सामंजस्य,ऐतिहासिक विवरण आदि आदि जो जहाँ प्रस्तुत किये हैं उसकी सूक्ष्मता लेकर कुशल रूप में प्रस्तुत होगी।जैसा कि मेरी आदत है सौ लोगों से कहूँ और क्या क्या किस से कहा सब याद रखूँ और भी बहुत कुछ मसाला है,मेरे पास।लोगों के बीच में उनको समझकर मौन जीवन जीता हूँ।पर यह मुझे बहुत खुशी देता है।संसार दूसरे तरीके का है।शरणागति स्वतः सिद्ध है।हम परमात्मा के थे,हैं और रहेंगे।परमात्मा की शरण में हैं तो भय कैसा।रूपा के लिए सन्देश किये तो भी भय नहीं था।क्योंकि मन में पाप ही नहीं था।यदि होता तो कबीर सिंह की तरह बुलेट पर चढ़कर रूपा के गाँव,शादी और दिल्ली में कट्टे के साथ हुडदंग करता।पर कितना दुःखद है रूपा चाहती थी कि उसे मैं महिला मित्र कह दूँ।ए बौनी बिल्कुल नहीं।अभिषेक एक दम संयमी है।जगन्माता जानकी की कृपा से इस संसार को हाथ पर रखे आंवले की तरह देखता है।फिर उनकी माया है।माता के गोरे-गोरे चरण कृपा बरसाते हैं।हम उनके दीवाने हैं।फिर विशुद्ध बेरोजगार की मारी अब करेगी क्या?यह देखना है।तुम्हें तो मणिकर्णिका जाना है।क्यों बौनी?और बौने को भी।दोनों मिलकर कोचिंग चलायेंगे।पर चलेगी कितनी।कुछ भी नहीं पता।रूपा मणिकर्णिका पर नाचेगी।ए बौने-बौनी कभी वृन्दावन का तीर्थ कर जाना।बहुत अच्छा रहेगा।अब क्या है बौनी मुतौना की तैयारी कर लेगी।क्यों री बौनी।कभी भैया ही कह देती।पर कहती क्यों रूपा के मन में पाप छिपा था।पाप अब भी छिपा है।रूपा के मन में।बेटा अभिषेक तो उसका ही होगा जिसके भाग्य में होगा।नहीं तो कुकर्मों में शामिल मनुष्य जाति का अभिषेक कभी नहीं हुआ और न होगा।अग्रिम पोस्ट में इस पुस्तक की योजना के भिन्न-भिन्न विकल्प,प्रेम भाव और उसका आधार, अनुशीलन और निदिध्यासन को अद्यतन किया जाएगा।यहाँ रूपा तुम्हारी जरूरत समझता हूँ।परन्तु तुमने कोई भी सुखद संवाद नहीं दिया।इस हेतु कोई नवीन विचार प्रस्तुत कर सकतीं थी।पर तुम्हें तो नाचना हैं मणिकर्णिका पर।क्यों री बौनी यदि शर्म हो तो कभी बात करना।बौनी कहीं की।डेढ़ फुटिया भी।तुम्हारे हिस्से में भय रहेगा।जय श्री राम।
©®अभिषेक: पाराशरः

Language: Hindi
1 Like · 1 Comment · 174 Views
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