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20 Aug 2023 · 1 min read

■ शायद…?

#क़तआ (मुक्तक)
■ शायद…?
“फ़क़त पाने ही पाने की थी मंशा,
उसे कुछ भी कभी खोना नहीं था।
ज़माने को दिखानी थीं अदाएं।
किसी का इसलिए होना नहीं था।।”
■प्रणय प्रभात■

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