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May 16, 2022 · 1 min read

ग़ज़ल

भले ये तुम्हारी रिवायत नहीं
मुहब्बत में मेरी मिलावट नहीं

ज़माने को होगी ज़रूरत भले
मुझे अब तुम्हारी ज़रूरत नहीं

लिखा है वही जो हमें सच दिखा
हमें झूठ लिखने की आदत नहीं

सफ़र में मिले हैं कईं हमसफ़र
बिना इनके बनती है दौलत नहीं

हर एक शख़्श है ग़मज़दा सा यहाँ
किसी चेहरे पर भी मसर्रत नहीं

हम अपनी ही मर्जी के राजा कमल
चलेगी यूँ हमपे हुकूमत नहीं

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