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16 Jul 2016 · 1 min read

ग़ज़ल

शाइर से शाइर जलने लगे हैं ।
खूँ के वो भूँके दिखने लगे हैं ।

यारों हमको भी जलना पड़ा है।
उनकी खातिर जो लिखने लगे हैं ।

रुकते रुकते मेरा दिल है धड़का
गलियों में अक्सर रुकने लगे हैं ।

हम बचते भी बचते कैसे’ बचते।
ख्यालों के बाहर मिलने लगे हैं।

उनसे कह के तो आये न आना
पर राहें उनकी चलने लगे हैं ।

दर्द-ए-तुह्फ़ा हाँ “तेजस” क़ुबूले ।
इश्क-ए-आयत अब पढ़ने लगे हैं ।

©प्रणव मिश्र’तेजस’

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