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5 Jun 2016 · 1 min read

ग़ज़ल।इक आशियाना मिल गया ।

ग़ज़ल।आशियाना मिल गया ।

आदमी को खुदा, खुद का ठिकाना मिल गया ।
फ़र्ज ,शिक़वे रह गये साहिल पुराना मिल गया ।

बेदख़ल होने लगा है अब वजूदे हुस्न से वह ।
सरज़मी के पार जाने का बहाना मिल गया ।।

आ रही थी बनके छाया रात हर दीदार करने ।
वक्त की बंदिश हटी मौका सुहाना मिल गया ।।

एकतरफ़ा प्यार से क़ायल रही जो उम्र भर ।
उम्र रूठी ,मौत को बेशक दीवाना मिल गया ।

दौलतों की शाने शौक़त हो गयी ख़ामोश देखो ।
लुट गया, खुद लूटकर सारा खज़ाना मिल गया ।।

आज तू ख़ामोश रोयेगा जबाना फ़र्क़ किसको ।
क़हक़हे दो चार दिन मातम मनाना मिल गया ।।

सो गये “रकमिश”न जाने लोग कितने शौक़ से । ।
जिंदगी को मौत का इक आशियाना मिल गया ।

रामकेश मिश्र”रकमिश”

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