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10 May 2018 · 1 min read

ख़ामोशियाँ

बड़ी लंबी जुबान की
होती है
ये ख़ामोशियाँ

शब्दों की
बैसाखियों के बिना ही
बहुत दूर तक
चली जाती हैं

कच्ची पक्की
अंजान पगडंडियों पर
निकल पड़ती हैं
मंजिल की ओर

अक्सर
सुलझा जाती हैं
उलझी मन की
गाँठों को
या फ़िर और
उलझा जाती हैं
गिरह के
रेशमी धागों को

ढुलक जाती हैं
कभी आँखों के
कोरों से
तो कभी
सरक आती हैं
होठों के
दबे किनारों से

धीरे धीरे
खोल जाती हैं ये
दिल के सारे राज़

आती है इन्हें
लिखावट
हर भाषा की
बस बाँचना पड़ता है
अहसासों की
पैनी नज़र से,,

Language: Hindi
285 Views
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