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15 Mar 2024 · 1 min read

हर लम्हा दास्ताँ नहीं होता ।

हर लम्हा दास्ताँ नहीं होता ।
हर अश्क बेज़ुबाँ नहीं होता ।
गुलो, बच के रहना ज़माने में –
हर शख़्स, पासबाँ नहीं होता।

सुशील सरना

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