Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
4 Mar 2024 · 2 min read

सुनो पहाड़ की….!!! (भाग – १०)

पहाड़ अपनी व्यथा कहता चला जा रहा था और मैं मगन उसे सुन रही थी। साथ ही समझने का प्रयास भी कर रही थी कि नींद में अचानक बादलों के गरजने का एहसास सा हुआ और नींद टूट गयी। बाहर तेज बारिश हो रही थी। रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। कुछ देर ख्यालों में उलझने के पश्चात मैं पुनः सो गयी।
अगले दिन सुबह चाय के बाद तैयार होकर हम एक बार फिर त्रिवेणी घाट की तरफ निकल आये। आज मौसम अत्यधिक सुहाना था। रात की बरसात के पश्चात बादलों एवं धूप की आवाजाही मानो आँख-मिचौली खेल रही थी। हवा में अजब ठंडक व ताजगी थी। गंगा किनारे का वातावरण बहुत मनमोहक था। घाट पर घूमते हुए हम एक बड़े पेड़ के नीचे आकर ठहर गये।
वातावरण में ठंडक एवं गंगा के तेज बहाव को देखते हुए अर्पण व अमित ने‌ नहाने का विचार छोड़ दिया। वे अपने-अपने मोबाइल में तस्वीरें खींचते हुए बातचीत में लगे हुए थे। जबकि मैं गंगा के उस पार पहाड़ पर दृष्टि जमाये रात के ख्यालों में उलझी थी। पहाड़ अपनी ऊँचाई व जंगल सहित सामने खड़ा था। गंगा के उस पार दिखते पहाड़ पर मानव प्रगति के अधिक चिन्ह दिखाई नहीं पड़ रहे थे। जंगल ही दृष्टिगोचर हो रहा था। किन्तु जंगल इतना घना नहीं लग रहा था और पहाड़ पर अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न कारणों से हुआ कटान व पहाड़ में मिट्टी दरकने से पड़ी बड़ी- बड़ी दरारें स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। साथ ही दिखाई दे रहा था पहाड़ पर फैला कचरा जो निश्चित रूप से मनुष्य की गतिविधियों का परिणाम था।
यह सब सोचते हुए मुझे ऋषिकेश आने पर एक दिन पूर्व की जंगल की यात्रा का स्मरण हो आया, तो ध्यान आया कि उस ओर भी रास्ते में गुजरते हुए हमने बहुत कूड़ा-करकट यहाँ-वहाँ फैला देखा था जो हम मनुष्यों की गतिविधियों के कारण ही एकत्र हुआ होगा। इन सब बातों का विचार करते हुए मुझे महसूस हो रहा था कि पहाड़ से मेरा वार्तालाप बेशक कल्पना ही रही हो, परन्तु वह कल्पना पूर्णतया सत्य पर आधारित थी।
मैं विचारमग्न थी कि अर्पण ने मुझे पुकार कर चौंका दिया, वह आश्रम लौटने के लिये पूछ रहा था। मेरे सहमत होने पर हम सब बाजार होते हुए आश्रम की ओर लौट चले। वापसी में हमने बाजार में कुछ खाया-पिया, कुछ खरीदने के विचार से बाजार घूमें, लेकिन कुछ खरीदने का इरादा नहीं बना तो हम आश्रम लौट आये। अब तक दोपहर हो गयी थी। अतः हमने थोड़ा आराम करने का मन बनाया और अपने कमरे में आकर आराम करने लगे। वैसे भी मुझे अपनी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी। ऐसीडिटी महसूस हो रही थी।

(क्रमश:)
(दशम् भाग समाप्त)

रचनाकार :- कंचन खन्ना,
मुरादाबाद, (उ०प्र०, भारत)।
सर्वाधिकार, सुरक्षित (रचनाकार)।
दिनांक :- २७/०८/२०२२.

43 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
Books from Kanchan Khanna
View all
You may also like:
संसार है मतलब का
संसार है मतलब का
अरशद रसूल बदायूंनी
भय के कारण सच बोलने से परहेज न करें,क्योंकि अन्त में जीत सच
भय के कारण सच बोलने से परहेज न करें,क्योंकि अन्त में जीत सच
Babli Jha
विश्वकप-2023
विश्वकप-2023
World Cup-2023 Top story (विश्वकप-2023, भारत)
(15)
(15) " वित्तं शरणं " भज ले भैया !
Kishore Nigam
मुझे तारे पसंद हैं
मुझे तारे पसंद हैं
ruby kumari
3500.🌷 *पूर्णिका* 🌷
3500.🌷 *पूर्णिका* 🌷
Dr.Khedu Bharti
* गीत कोई *
* गीत कोई *
surenderpal vaidya
"इस रोड के जैसे ही _
Rajesh vyas
नफ़रत सहना भी आसान हैं.....⁠♡
नफ़रत सहना भी आसान हैं.....⁠♡
ओसमणी साहू 'ओश'
आजकल अकेले में बैठकर रोना पड़ रहा है
आजकल अकेले में बैठकर रोना पड़ रहा है
Keshav kishor Kumar
जीवन बूटी कौन सी
जीवन बूटी कौन सी
महावीर उत्तरांचली • Mahavir Uttranchali
"बैठे हैं महफ़िल में इसी आस में वो,
डॉ. शशांक शर्मा "रईस"
रूबरू मिलने का मौका मिलता नही रोज ,
रूबरू मिलने का मौका मिलता नही रोज ,
Anuj kumar
डॉ अरूण कुमार शास्त्री
डॉ अरूण कुमार शास्त्री
DR ARUN KUMAR SHASTRI
*राज दिल के वो हम से छिपाते रहे*
*राज दिल के वो हम से छिपाते रहे*
सुखविंद्र सिंह मनसीरत
तृष्णा उस मृग की भी अब मिटेगी, तुम आवाज तो दो।
तृष्णा उस मृग की भी अब मिटेगी, तुम आवाज तो दो।
Manisha Manjari
बेटियां
बेटियां
Mukesh Kumar Sonkar
अंतिम क्षण में अपना सर्वश्रेष्ठ दें।
अंतिम क्षण में अपना सर्वश्रेष्ठ दें।
Bimal Rajak
जब तक हो तन में प्राण
जब तक हो तन में प्राण
अनिल कुमार गुप्ता 'अंजुम'
उड़ान ~ एक सरप्राइज
उड़ान ~ एक सरप्राइज
Kanchan Khanna
"सच्चाई की ओर"
Dr. Kishan tandon kranti
🪁पतंग🪁
🪁पतंग🪁
Dr. Vaishali Verma
इन आँखों को हो गई,
इन आँखों को हो गई,
sushil sarna
प्रकृति के स्वरूप
प्रकृति के स्वरूप
डॉ० रोहित कौशिक
मैं जब करीब रहता हूँ किसी के,
मैं जब करीब रहता हूँ किसी के,
Dr. Man Mohan Krishna
आज की पंक्तिजन्म जन्म का साथ
आज की पंक्तिजन्म जन्म का साथ
कार्तिक नितिन शर्मा
While proving me wrong, keep one thing in mind.
While proving me wrong, keep one thing in mind.
सिद्धार्थ गोरखपुरी
हिंदी दिवस पर एक आलेख
हिंदी दिवस पर एक आलेख
कवि रमेशराज
मेरा कल! कैसा है रे तू
मेरा कल! कैसा है रे तू
Arun Prasad
मैं मधुर भाषा हिन्दी
मैं मधुर भाषा हिन्दी
डॉ विजय कुमार कन्नौजे
Loading...