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“सभ्यता और संस्कार”

यूँ सभ्यता को लुटने न दो,
यूँ सत्यता को मिटने न दो,
यूँ कल्पना को तोडो नहीं ,
यूँ मनुष्यता को रौंदो नही ,
समय की पुकार सुनो तुम सभी,
हाहाकार मनुज की सुनो तुम सभी ,
रक्त की प्यास क्यों है तुम्हे,
झूठ से आस क्यों है तुम्हे,
अस्तित्व सत्य का समझे नहीं ,
मूल्य जीवन का जाने नहीं,
हर तरफ़ छायी है भय की घटा,
शांति क्यों नहीं ये तो बता,
लगी है आग ये कैसी वतन में ,
सुलग रही है वसुन्धरा देश की,
जल रही है सभ्यता , मिट रहे हैं संस्कार,
जल रहा है आदमी, लुट रही है आन,
अब तो तलाश है ऐसे तरुवर की ,
जिसकी शाख पर उगे……,
स्नेह का फूल व शांति का फल ,
जिसकी छाया में पुष्पित व पल्लवित हों,
सभ्यता और संस्कार||

…………निधि………

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