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17 Jan 2023 · 1 min read

सफलता की जननी त्याग

जलाता है खुद को जब
तभी सूरज चमकता है
चलता है अंगारों पर जो
वही मंजिल पर पहुंचता है

है रीत यही इस जग की
घड़ा तपकर ही पकता है
चाह से कुछ भी नहीं होता
अंधेरा रोशनी से ही मिटता है

चीरता है जब इस धरा को
तभी अंकुर फूटता है
करोगे कोशिश जब तुम
तभी फल पेड़ों से टूटता है

बनता नहीं कोई यूं ही नीलकंठ
ज़हर का प्याला पीना पड़ता है
नहीं बनता कोई मर्यादा पुरुषोत्तम यूं ही
त्याग कर राज वनों में भटकना पड़ता है

होता नहीं तेज चेहरे पर सभी के
घोर तपस्या करनी पड़ती है
कोई बन नहीं जाता दधिचि यूं ही
अपनी हड्डियां गलानी पड़ती है

हर कोई मसीहा नहीं बन पाता
उसके लिए गांधी बनना पड़ता है
अपने अधिकारों को पाने के लिए
ताकतवर से भी लड़ना पड़ता है

दिल तो धड़कता है सभी का
एक तड़पन जगानी पड़ती है
यूं ही नहीं मिल जाती मंज़िल
दिल में आग जलानी पड़ती है।

Language: Hindi
10 Likes · 2 Comments · 1006 Views
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