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Jun 15, 2016 · 1 min read

सत्य

सत्य की खोज में
निकल आया था सागर के पार
जाने कितने पथ और मेरे पाँव
उन पर मिले झरनो की अविरल धार
मेरी चेतना में सिमटी हुई असंख्य झाँकीया
जो पदार्पण कर चुकी है निशा के इन पलो में,मेरे नयनो के समीप
अनन्त पर चलते-चलते
वृत्ति नहीं बदलती परन्तु मेरी
जीवन का हर पड़ाव यात्रा को पुकारता है
आभासो से चैतन्य सत्य को निहारता है
यही यात्रा का मंतव्य
जीवन का अटल सत्य है
यात्री तेरी यात्रा तो बस इतनी है
तेरे शरीर में श्वास जितनी है

1 Comment · 340 Views
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