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6 Jan 2023 · 1 min read

शहनाइयों में

ग़ज़ल
221-2121-1221-212

खुशबू किसी की आज भी पुरवाइयों में है
वो साथ मेरे चल रही तनहाइयों में है

करता है तू दिखावा तो मस्ती का हर घड़ी
दर्दीली धुन क्यों तेरी शहनाइयों में है

जो सोने की चिरैया मेरे मन में क़ैद है
फिर क्यों चहक रही घनी अमराइयों में है

वो दूर सिर्फ हो गई दुनिया की नज़र में
दिखती मुझे यूँ पास ही परछाइयों में है

लो प्रेम नाम पर तो सुधा शोर फिर मचा
गंधिल वो आज भी उन्हीं रुसवाइयों में है

डा. सुनीता सिंह ‘सुधा’
4/1/2023

Language: Hindi
1 Like · 369 Views
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