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17 Jun 2023 · 1 min read

लहू जिगर से बहा फिर

लहू जिगर से बहा फिर किसी की यादों का
इन्हें बुझा दो अभी काम क्या चराग़ों का

सज़ा-ए-हिज्र से बढ़कर सज़ा नहीं कोई
मुझे पता तो चले कुछ मेरे गुनाहों का

सिवाय सब्र के हम और कर भी क्या सकते
कभी तो वक़्त ये बदलेगा हम अभागों का

अजीब दौर से गुज़री है ज़िन्दगी मेरी
कोई इलाज नहीं है मेरी कराहों का

मैं क्यों न देख सका आईनों में क़द अपना
कुसूर कम तो नहीं है मेरी निगाहों का

— शिवकुमार बिलगरामी
— Shivkumar Bilagrami

Language: Hindi
3 Likes · 1 Comment · 1949 Views
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