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3 Sep 2016 · 1 min read

रूह

रूह एक दिन बदन से निकल जायेगी
बस यूँ ही तकदीर सभल जायेगी

किरण आसमा बन लपट जलं जायेगी
नीचे वालों की क्यूं याद कल जायेगी

नदियाँ बह चट्टान में बदल जायेगी
हिमालय की गोद फिर छल जायेगी

जेहन मे छुपी चाह यूँ ही टल जायेगी
जब तेरी पोल फिर से खुल जायेगी

खामोशियाँ कुछ कह उछल जायेगी
हिचकियाँ जब तलक मचल जायेगी

एक दिन खुदा की खुदाई चल जायेगी
जब वह तुझे फिर से मिल जायेगी

यूँ आस फिर मिलन की मधु पल जायेगी
जब हवा जमाने की फिर बहल जायेगी

डा मधु त्रिवेदी

Language: Hindi
73 Likes · 687 Views
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