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20 Oct 2016 · 1 min read

राज योग महागीता: गुरुप्रणाम: ज्ञानकी जो मूर्ति हैं:: जितेन्द्र कमल आनंद: (पोस्ट६३(

गुरु प्रणाम ::: घनाक्षरी
————————
ज्ञानकी जो मूर्ति हैं , श्री श्री आनंद के जो धाम हैं ,
हैं करते अपना नहीं कभी भी सुप्रचार जो ।
चाहता अहेतुकी ही कृपा , कृपा निधान से ,
उनकी कृपा के बिना सब कुछ असार जो ।
भक्ति – भाव से विभोर सार्थक हुआ है यह,
गुरु हैं समर्थ, दिया जीवन उपहार| जो ।
जिसकी कृपा से रचूँ काव्य यह पुनीत मैं,
करता प्रणाम उनको ज्ञान के भण्डार जो ।।४!!

—– जितेंद्रकमलआनंद

Language: Hindi
204 Views
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