Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
15 Feb 2024 · 3 min read

राजर्षि अरुण की नई प्रकाशित पुस्तक “धूप के उजाले में” पर एक नजर

प्रिय अरुण की साहित्यिक यात्रा का नया पड़ाव है, आदर्श प्रकाशन,नई दिल्ली से हाल में प्रकाशित उनकी नई पुस्तक “धूप के उजाले में” ।अंशुमान भदोरिया की कलात्मकता से सजा मुख्य आवरण निस्संदेह आकर्षक दिखता है और प्राक्कथन में रणविजय सिंह सत्यकेतु द्वारा खतरों से सावधान करने की बेचैनी पुस्तक को प्रारंभ से अंत तक एक ही दम में पढ़ लेने की जिजीविषा को निश्चित बढ़ा देती है,पर शर्त्त इतनी कि बीच में कोई साजिश न कर दे।

बबूल और नागफनी ने साथ मिलकर
गुलाब की इतनी भर्त्सना की
कि उसे अपनी जड़ों से ही नफरत हो गई
उसकी सुगंधि स्वयं उसे दुर्गंधि लगने लगी।

“ये साजिश नहीं तो क्या है” कविता के माध्यम से आज की राजनीति व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है, जहाॅं गुलाब के विरुद्ध साजिश में बबुल और नागफनी के संग चुप बैठे लोग भी उसी के रंग में रंग जाते हैं। अच्छाई के विरोध में लोग तटस्थ भी कहाॅं रह पाते हैं ? बिना देर किये बुरे लोगों की जमात में शामिल हो जाते हैं और जिसका परिणाम तो बिल्कुल साफ है।

“सुनामी” नाम की कविता भौगोलिक सुनामी और परिस्थितिवश मानव के मन में उठ रहे सुनामी के साथ तारतम्य स्थापित कर थोड़ा कुछ बचे हुए में ही पूर्ण निर्माण की सकारात्मक कल्पना के साथ आगे बढ़ती है।
शीर्षक कविता “धूप के उजाले में” किसी भी परिस्थिति में विकृत दृश्य की वकालत करने की बात तो नहीं ही करती है। सब कुछ पारदर्शी नजर से साफ-साफ देखने की बात करती है। दूसरी ओर विज्ञापन पर आधारित बाजारवाद की दुनिया में “व्यवस्था” कविता वर्तमान समय में प्रचलित व्यवस्था में लोगों से सब कुछ छीन लेने के बाद भी उसे आश्वस्त करने का अंतिम दम तक का प्रयास है कि सब कुछ तो तेरा ही है और लोग इसी भ्रमजाल में आशावान होकर पूरी उम्र ही गुजार देता है।
“मेरा हाल” कविता निर्मम कटाक्ष है,जो रोशनी और अंधकार के मध्य हो रहे जंग में साफ-साफ घोषणा है।

पर एक बात जो समझ में आई साफ-साफ
तुम्हारे भीतर भी अंधकार है अत्यंत घना

अंधभक्ति कविता बिना किसी तर्क के मनुष्य को किसी के प्रति ऑंख मूंद कर विश्वास का भाव रखने की प्रेरणा पर महीन कटाक्ष है,जहां अपनी भक्ति की अतिरेक भावना के प्रर्दशन को मनुष्य सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करता है।
यह एक जंग लगे लोहे के समान है
जहां खुद लोहा इसे अपना सुरक्षा कवच समझता है।

वहीं दूसरी ओर वध कविता हिंसा के पथ पर चलकर अपने अराध्य के प्रति समर्पण की भावना है,जो बलि के नाम पर असमय ली जाने वाली निर्दोष जान और सहज होने वाली मृत्यु पर तंज कसती है।
इसके साथ ही ढ़ेर सारी ऐसी कविताएं भी इस संग्रह में हैं, जो अपने में अलग-अलग अर्थ समाहित कर पठनीय है।
राजर्षि अरुण वर्षों से निर्भय होकर साहित्य का अलख जगाकर महत्त्वपूर्ण साहित्यिक भूमिका का निर्वहन करते हुए आगे की ओर अग्रसर हैं और बिना ताम झाम पाठकों के ह्रदय को झकझोर कर उनमें मानवीय मूल्यों के अनुरुप मानवीय भावनाओं का संचार करने में अग्रणी।काॅलेज के समय से ही उनके एक से एक सुंदर कालजयी रचना का साक्षी रहा हूॅं मैं। परिस्थिति अनुरुप सरल और सुन्दर शब्दों का चयन इस संग्रह का श्रृंगार है,जो पाठकों के लिए पुस्तक को सहज बनाते हुए पाठक और पुस्तक की परस्पर दूरी को भी कम करती है। यह अनकही,अनूठी और कहीं कहीं उलझती प्रतीत होती हुई सुलझी रचनाओं से सजा संग्रह है,जिसमें कविताएं नहीं कुछ कहते हुए भी गुम सुम होकर बहुत कुछ कह जाती है,जो मन को उद्वेलित और झंकृत कर पाठकों के समक्ष विचार करने के लिए ढ़ेर सारे प्रश्न भी खड़ा कर देता है। उनकी कविता पढ़ने पर ऐसा आभास होता है कि कवि कविता लिखते नहीं,बल्कि शब्दों को गढ़ते हैं,जो स्वत:कविता बनती जाती है।आशा करता हूॅं कि अरुण की लेखनी निर्बाध रुप से अपनी सधी हुई चाल में निरन्तर चलती रहे। इस नव सृजन के लिए अरुण को ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।

76 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
Books from Paras Nath Jha
View all
You may also like:
जवाला
जवाला
भरत कुमार सोलंकी
*
*"शिव आराधना"*
Shashi kala vyas
" तुम्हारी जुदाई में "
Aarti sirsat
नया साल
नया साल
umesh mehra
"यादें"
Yogendra Chaturwedi
फागुन
फागुन
पंकज कुमार कर्ण
'बेटी बचाओ-बेटी पढाओ'
'बेटी बचाओ-बेटी पढाओ'
Bodhisatva kastooriya
मुस्कुराना चाहते हो
मुस्कुराना चाहते हो
surenderpal vaidya
नहीं देखा....🖤
नहीं देखा....🖤
Srishty Bansal
रास्ते  की  ठोकरों  को  मील   का  पत्थर     बनाता    चल
रास्ते की ठोकरों को मील का पत्थर बनाता चल
पूर्वार्थ
जिंदगी की ऐसी ही बनती है, दास्तां एक यादगार
जिंदगी की ऐसी ही बनती है, दास्तां एक यादगार
gurudeenverma198
भूखे भेड़िये हैं वो,
भूखे भेड़िये हैं वो,
Maroof aalam
?????
?????
शेखर सिंह
लिख लेते हैं थोड़ा-थोड़ा
लिख लेते हैं थोड़ा-थोड़ा
Suryakant Dwivedi
*सवा लाख से एक लड़ाऊं ता गोविंद सिंह नाम कहांउ*
*सवा लाख से एक लड़ाऊं ता गोविंद सिंह नाम कहांउ*
Harminder Kaur
पास बुलाता सन्नाटा
पास बुलाता सन्नाटा
डाॅ. बिपिन पाण्डेय
यह शहर पत्थर दिलों का
यह शहर पत्थर दिलों का
VINOD CHAUHAN
🙅खटारा सरकार🙅
🙅खटारा सरकार🙅
*Author प्रणय प्रभात*
"कलम की ताकत"
Dr. Kishan tandon kranti
दिवस नहीं मनाये जाते हैं...!!!
दिवस नहीं मनाये जाते हैं...!!!
Kanchan Khanna
मुझ को किसी एक विषय में मत बांधिए
मुझ को किसी एक विषय में मत बांधिए
सुशील मिश्रा ' क्षितिज राज '
2509.पूर्णिका
2509.पूर्णिका
Dr.Khedu Bharti
मिष्ठी रानी गई बाजार
मिष्ठी रानी गई बाजार
Manu Vashistha
फितरत
फितरत
Ravi Prakash
लोकतंत्र तभी तक जिंदा है जब तक आम जनता की आवाज़ जिंदा है जिस
लोकतंत्र तभी तक जिंदा है जब तक आम जनता की आवाज़ जिंदा है जिस
Rj Anand Prajapati
गीत प्रतियोगिता के लिए
गीत प्रतियोगिता के लिए
Manisha joshi mani
मिलना था तुमसे,
मिलना था तुमसे,
shambhavi Mishra
बेफिक्र तेरे पहलू पे उतर आया हूं मैं, अब तेरी मर्जी....
बेफिक्र तेरे पहलू पे उतर आया हूं मैं, अब तेरी मर्जी....
डॉ. शशांक शर्मा "रईस"
हटा 370 धारा
हटा 370 धारा
लक्ष्मी सिंह
परमूल्यांकन की न हो
परमूल्यांकन की न हो
Dr fauzia Naseem shad
Loading...