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‘‘मैं ………जीवन……… हूॅं’’

मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर।

मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर,
फेंक दिया इस धरा पर।
पूर्वजन्म के संस्कार,
ले आए जाने किस पार ।
सांसों का चल निकला सार,
बहने लगी जीवन की धार ।
समझ सका ना इस पार,
निर्दोश-अबोध कहलाया यार।
बेसुध ही रह गया पत्थर,
मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर।।

जननी-जनक ने लिया संभाल,
असहाय की बन गए ढाल।
निज गुणों का सार निकाल,
बेढंगे में दिया उनको डाल।
भाई-बहनों का प्यार कमाल,
करे तिरछी नजर – किसकी मजाल।
समाज बिछाने लगा अपना जाल,
दुनिया की समझ आने लगी चाल।
अनगढ आवारा नहीं रहा पत्थर,
गढ रहा था समाज अब पत्थर।
मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर।।

शिक्षकों ने अपार समझाया,
शिक्षा का सागर छलकाया।
संसारी ज्ञान भले कम पाया,
कई साल तक अव्वल आया।
नई तकनीक ने जाल फैलाया,
बुद्धि ने था कदम बढाया।
‘कुछ’ होने का लक्ष्य बनाया,
गजब आत्मविश्वास को पाया।
ज्ञान की चमक में पड गया पत्थर,
करवट लेने लगा था पत्थर।
मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर।।

संगत दोस्तों की अच्छी पाई,
सद्कर्मांे से यारी लगाई।
सदा साथ रही सच्चाई,
हर मोड पर झूठ हराई।
श्रद्धा विश्वास की राह अपनाई,
ईज्जत करी और ईज्जत कराई।
कई धोखों से मार भी खाई,
हर एक ने सीख सिखाई।
चमक की रगड से पत्थर,
चमक पाने लगा था पत्थर।
मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर।।

गुरुजी ने चमक पहचानी,
पत्थर होने लगा अब पानी।
जीवन परीक्षाआंे की कहानी,
छूट चली सब राह पुरानी।
सुप्त-द्वारों की राह निशानी,
कृपा हुई – ‘ध्यान विधियाॅं’ जानी।
पूर्ण समर्पण की जिन्दगानी,
मन्त्र पाया यह गुरु जुबानी।
‘हीरे’ की चमक में आया पत्थर,
‘हीरे’ की संज्ञा पा रहा था पत्थर ।
मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर।।

अद्र्धांगिनी का संग भरपूर,
प्रेम में रहने लगे सदैव चूर।
सखी-मां-बेटी बनी हूर,
झुका दिए कई मगरूर।
‘गौरी-शंकर’ शिखर मशहूर,
दिखाई भले दिया हो दूर।
चढने का जो लगा शुरूर,
कदम चूम किया मजबूर।
‘हीरा’ बना पडा था पत्थर,
तराशा ‘हीरा’ ना रहा था पत्थर ।
मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर।।

संतान मिली आखरी पडाव में,
जीवन-ज्ञान बहाया बहाव में।
बनते-बिगडते रिश्तों के गाॅंव में,
जीने का ढंग सिखाया चाव में।
सुख-दुख उतर आया पाॅंव में,
जा चढा ‘सन्यासी’ नाव में।
वास हुआ ‘मौन’ की छाॅंव में,
परमात्मा बरसा ‘शून्य’ ठहराव में।
अस्तित्व में बिखरा ‘हीरा’ बना पत्थर,
अन्तिम शब्द रहे –
‘‘ मैं ………. अनगढ आवारा पत्थर।।।’

आज दिनांक 10.03.2017 को अपने तथाकथित जीवन के 38 वर्ष पूरे करने पर 15 अगस्त 2004 को रचित यह कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत की है। कृपा अपनी राय जरुर देंवें। धन्यवाद – आपका – राजेश कुमार लठवाल।

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