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4 Jul 2018 · 1 min read

मृग मरीचिका

नसीहतें इश्क में एक बार नही,
बार-बार हमें मिलता रहा…

मरीचिका के तरह छुप-छुप कर
वो मुझसे दूर जाती रही…

प्यासे मृगा के तरह भटकता-भटकता
हुआ, मैं उसके करीब जाता रहा…

उसको मालूम था।।।।

उसके ऑगन में सजी थी जो महफिल
वो मेरे, जश्न-ए-जख्मों की थी मगर

वो सवर-सवर कर सवरती रही
मैं बिखर-बिखर कर बिखरता रहा…

सजा-ए-इश्क कहू इसे या रिबायत
जमाने की ?

रो रो कर वो अपनी खुशियाँ छलकाती रही,
हस-हस कर मैं अपनी ऑशु छिपाता रहा…

-के के राजीव

Language: Hindi
380 Views
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