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Nov 23, 2016 · 1 min read

मुक्तक

2212 2212 2212 2212

ये भूल मानव की कहूँ ,या काल की मैं क्रूरता।
मानव मगर इस चीज़ को,कहता रहा है वीरता।।
कैसे कहें भगवान हम पर रूठ जाता है कभी।
कब मानता मानव बताओ देवता की धीरता।।

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भाऊराव महंत “भाऊ”

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