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24 Jul 2016 · 1 min read

मिटा ले यार दिल की तश्नगी को

मिटा ले यार दिल की तश्नगी को
जगा दिल में ज़रा आवारगी को

दिले जज़्बात ले के दिल हूँ आया
दिखा दूँ यार मैं भी आशिक़ी को

ज़रा सा आसमाँ में उड़ना चाहा
चुभी परवाज़ मेरी हर किसी को

मिरी चाहत ने सबको दिल से चाहा
कुई समझा न मेरी सादगी को

निगाहें पढ़ने का मैं भी हूँ’ माहिर
समझ पाया न लेकिन आदमी को

कभी आकर ये देखो महफिलों में
कभी समझोगे तुम भी शायरी को

भुलाई हमने सबकी बेवफ़ाई
भुलादे यार अपनी बेखुदी को

मग़र जज़्बाती इतना तो बतादे
सभी रखते क्यों इस बेरुखी को
जज़्बाती

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