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महापंडित ठाकुर टीकाराम (18वीं सदीमे वैद्यनाथ मंदिर के प्रधान पुरोहित)

#वैद्यनाथ_मन्दिर_कथा भाग -02

—-***—–

1745 ई. मे दीघर्ष संदहपुर मूलक
शांडिल्य गोत्रीय श्रोत्रिय ब्राह्मण ठाकुर टीकारामकेँ विधिवत वैद्यनाथ मन्दिरक प्रधान पुरोहित बनाओल गेल । दोसर दिस तिरहुत पड़ोसी राजा सभसँ लड़ाइमे लागल रहै । न्यायशास्त्र के खातिर जानल जाए वाला ई क्षेत्र आब उथल-पुथल मे छल। मुदा भौराक सड़क पऽ मिथिलाधीश नरेन्द्रक शौर्यक झंडा लहर लहर लहरा रहल छल । खण्डवाला वंशक खण्ड (एक प्रकारक तलवार) पर तिरहुतिया लोकक बहुत आस्था छलनि। ई मुगल काल छल आ मुगलक वर्चस्वकेँ अफगानी सभ चुनौती दऽ रहल छल ।

ठाकुर टीकाराम जी के शुरूमे वैद्यनाथ मंदिरमे बहुत विस्मय के सामना करैय पड़ल जखन बाबा बैजूक दरबारमे पहिल पूज्य देव गणेश के स्थापना नै भेल छल। हुनका लोकनिक बिना कोनो देवताक पूजा कोना संभव छै ? संगे-संग
मिथिलाधीश महाराजा नरेन्द्रसँ आर्थिक सहायता भेटलाक बाद ओ मन्दिरक निर्माणक काज शुरू कए देलन्हि। विस्मय के एकटा आओर कारण ई छल जे आपस मे गद्दी के लेल लड़ब अपन धर्म के बर्बाद करय के बराबर हैं . जँ एतेक ऊर्जा जनकल्याण खातिर खर्च कएल जाएत तखन ओ सामाजिक प्रगतिक वाहन बनि सकैत अछि।किछ समय बाद ओ अपन पूर्ववर्ती मठक प्रमुख जय नारायण ओझाकेँ मन्दिरक निर्माण कार्य सौंपैत तिरहुत चलि गेलाह। एम्हर जय नारायण अपन भतीजा यदुनंदा केँ ई पद सौंप देलनि।चूँकि जय नारायणक जेठ पुत्र नारायण दत्त एहि पद पर बैसि सकैत छलाह मुदा ओ नाबालिग आ अयोग्य छलाह। तेँ भातिजकेँ हड़बड़ीमे नियुक्ति कएल गेल।एहि नियुक्तिक प्रचार महाराजा दरभंगाक क्रोध सँ बचबाक लेल नै कतहु कैल गेल,मुदा यदुनन्द ओझाक नाम गिद्धौर महाराजक किछ अभिलेखीय साक्ष्यमे भेटैत अछि, जेसो आधार पर इतिहासकार लोकनि हिनका ‘प्रधान कार्यकारिणी’ हेबाक शंका व्यक्त कयलनि अछि।

तिरहुतक सोदरपुर गामक रहनिहार टीकाराम फेर भौराक राजभवन जाकऽ मन्दिर निर्माण लेल भेटल आर्थिक सहयोग सँ किछु अंतराल पर आगू बढ़ैत रहलाह। 1753 ई0 मे मिथिलाधीश महाराज नरेन्द्र कन्दर्पी घाटक युद्ध लड़लनि। एहि समय पंडित टीकाराम ‘श्री गणेश प्रशस्ति’ केर रचना केने छलाह। ओ एकटा आओर ग्रंथ ‘श्रीवैद्यनाथ पूजा-व्यवस्था’ के रचना क’ रहल छलाह.

कन्दर्पी घाटक युद्धसँ ओ बहुत आहत भेलाह। मन निरागसक प्रति आकृष्ट भेल। पिता महामहोपाध्याय प्राणनाथ सेहो हिंसासँ असंतुष्ट भऽ महाराजक अनुमतिसँ अनजान यात्रा पर निकलि गेलाह। कहल जाइत छै कि
ओ काशी गेल रहै । हिनक द्वारा रचित अनेक रचनामे ‘चक्रव्यूह’क एकटा पाण्डुलिपि नागरी प्रचारिणीक कोषागारमे सुरक्षित अछि।

कोमल मन केर स्वामी आ ज्योतिष केँ महान विद्वान श्री टीकाराम भगवान शिव के आश्रयमें फेरो घुरि वैद्यनाथ धाम आयो ।एतय हुनका पता चललनि जे पूर्व मठ-उच्छैर्वे (मठप्रधान) जिनका ओ प्रभाग देने हथि ओ पद हुनक पुत्र देवकीनंदन केँ सौंप देलनि। देवकीनन्दन स्वभावमे बहुत उग्र छलाह। हिनका द्वारा अपन पितियौत भाइ नारायण दत्तक संग कयल गेल अन्यायक चर्चा भगवती कालीक महान संस्कृत पंडित आ विलक्षण साधक कमलदत्त (द्वारी) केर डायरी मे भेल अछि। वैद्यनाथ मन्दिरक सिंह द्वारा पर उपरोक्त शिलालेखक रचना राजा बनैलीक स्तुतिक लेल वैह कमलादत्त केने रहथिन !

उदय शंकर
लेखक इतिहासकार अछि

(क्रमशः) २.
1787 में विलियम होजेस द्वारा तेल चित्रकला
सौजन्य : ब्रिटिश पुस्तकालय

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