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2 Mar 2017 · 1 min read

मय-ए-मुहब्बत

भूली जाती नहीं मुहब्बत इस ज़माने में,
कोशिश तो बहुत की हमने भी मैखाने में,

आ आ के तंग करती थीं तन्हाइयों में,
बहुत मर्तबा बंद की यादें तहखाने में,

जख्म नासूर बने, कई मौसम-ए-हिज़्राँ में,
वक़्त लगा दर्द को भी, दिल में समाने में,

लहू में घुले, रुके हुए अश्क बहे नस-नस में,
आतिशे-इश्क़ से प्याला-ए-ज़हर बनाने में,

रगों में दौड़ता खून, लाया ज़हर का असर जुबां में,
तल्ख़ लहज़ा करने में, अलफ़ाज़ में दर्द जगाने में,

दिल में बनी मय-ए-मुहब्बत ‘दक्ष’ ले आया ज़माने में,
चंद अशआरों और ग़ज़ल के पैमाने में,

उठाओ पैमाना, लुत्फ़ लो लब पे लगाने में,
कोशिश तो बहुत की हमने भी मैखाने में,

-विकास शर्मा ‘दक्ष’-

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