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3 Feb 2024 · 1 min read

बेटियां / बेटे

बेटियां फ़र्ज़ निभाती रहीं
बेटे हक़ जताते रहे ,

बेटियां दुःख-दर्द संभालती रहीं
बेटे वसीयतें बनवाते रहे ,

बेटियां अपना हक़ भाई को दे देती रहीं
बेटे भाई के आधे को भी हड़पते रहे ,

बेटियां पिता की मां बनती रहीं
बेटे बस लड़के ही बनते रहे ,

बेटियां घर-बाहर संभालती रहीं
बेटे बस बाहर में ही उलझे रहे ,

बेटियां पेट कटवा कर भी रसोई में खड़ी रहीं
बेटे ज़रा से जुक़ाम में बिस्तर पर पड़े रहे ,

बेटियां विधवा होकर सफेद होतीं रहीं
बेटे रंडवा होकर लाल सेहरा बांधते रहे ,

बेटियां घर-ख़ानदान की नींव कहलाती रहीं
बेटे परंपराओं के शिखर बनकर इठलाते रहे ,

बेटियां अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो कहती रहीं
बेटे हर बार बस और बस लड़के का जनम मांगते रहे ।

स्वरचित एवं मौलिक
( ममता सिंह देवा )

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