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प्रतिबिम्ब

आईने के इस शहर में
हर चेहरा अपना सा लगता हैं

मैं रूखा रूखा तो
सब रूखे रूखे
मैं खुशियों का सागर तो
सब मौजी लहरें सी लगती है

मैं कपटी तो सब कपटी
मैं दानवीर तो सब कर्ण से लगते है
आस पास के कोई और नही
मेरा ही प्रतिबिम्ब लगते है….

प्रो. दिनेश गुप्ता

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