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15 Jul 2018 · 1 min read

पेड़

मत छीनों मुझसे हरियाली
मेरी छाया सबको प्यारी
रो रो कर मैं रूदन हूँ करता
वार कुल्हाड़ी का जब पड़ता
मेरे कष्ट का मर्म भी समझो
इस तरह मत काटो मुझको
किस तरह बादल ने सींचा
नन्हा सा अंकुर जब फूटा
खूब माली ने मुझे सहलाया
फला फूला तब मन को भाया
फल फूल मेरे सब मीठे मीठे
खा कर सबका मन हर्षाया
भूल गए क्या छाँव सुहानी
मर गया क्या आँखों का पानी?
मत काटो मत फूंको मुझको
पिता सा साया दूँगा तुझको
सबका भला किया करता हूँ
फल और छांव दिया करता हूँ
मूक बधिर ना समझो मुझको
इस तरह ना लूटो मुझको।
कहाँ पाओगे शीतल छाया?
गर्मी से जब तपेगी काया…
राह मुसाफिर जब भटकेगा
कैसे शांत क्षुदा करेगा?
एक बार तो फिर से विचारो
स्वच्छ श्वास तनमन में धारो।
मुझसे ही जीवन हो पाते
च्छेदन कर क्यों, मुझे रूलाते?
निधि भार्गव

Language: Hindi
289 Views
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