पापा जी

पापा जी
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पापा जी आदर्श हमारे सचमुच जग से न्यारे थे।
ख़ूब दिलाते मौसम के फ़ल लगते हमको प्यारे थे।
रात समय नौ बजते सोना सुबह उठाते जल्दी से।
गाँव गली पगडण्डी सबसे परिचय रोज़ हमारे थे ।।

दातून नीम की स्वयं तोड़कर हमको भी चबवाते थे।
मिले फ़ायदे उसके कितने विधिवत रोज़ गिनाते थे ।
खेत किसानी घर कामों की कितनी ज़िम्मेदारी थी ।
ख़ुशी-ख़ुशी वह उनको करते कंधे नहीं झुकाते थे ।।

स्वर व्यंजन उच्चारण करना पापा हमें सिखाते थे।
रोज़ पहाड़े मौखिक दस तक हमको ख़ूब रटाते थे।
अक्षर ज्ञान हुआ जब पूरा उम्र बढ़ी जब थोड़ी तो ।
अक्षर-अक्षर जोड़-जोड़ कर शब्द ज्ञान करवाते थे।।

साथ – साथ हम दोनों भाई पैदल पढ़ने जाते थे।
कभी-कभी जब झगड़ा होता पापा से बतलाते थे।
कभी डांट तो कभी पिटाई शायद घटना होती थी।
ज्यादातर तो बड़े प्यार से पापा जी समझाते थे ।।

उचित समय में काम ज़रूरी पापा जी निबटाते थे।
शाम-सुबह जब पढ़ने बैठें संग में रोज़ पढ़ाते थे।
नैतिक शिक्षा विषय हमरा सबसे अच्छा होता था।
विषय नहीं व्यवहार हमारा पापा जी बनवाते थे ।।

गणित और विज्ञान विषय से रखते गहरे नाते थे।
विषय एक अंग्रेजी बस थी जिससे हम घबराते थे।
पापा जी ने दिया हौंसला याद मायने करवाई ।
अंग्रेजी यह प्यारी लगती जिससे आँख चुराते थे।।

घटनाओं के गहरे आशय, पापा जी समझाते थे।
बिना कहे वह व्यवहारों से,करके भी दिखलाते थे।
दूर तलक मैं देखूँ उतना, जो ख़ुद देख न पाएँ वे ।
ऐसी चाहत मन में रख कर,कंधों पर बिठालते थे।।

व्यवहारिक सच्चाई को भी पापा जी समझाते थे ।
ग़लत सही को जाँचो कैसे पापा यूँ बतलाते थे ।
कोई देखे सुने कोई ना और कहीं कुछ कह ना दे ।
तीन बात यह लागू जिसमें ग़लत उसे ठहराते थे ।।

राजतंत्र के मुखर विरोधी लोकतंत्र अनुयायी थे ।
समतामूलक सोंच किसी की करते आप बड़ाई थे ।
आडंबर के सदा विरोधी प्रकृति प्रेम संग नाता था ।
ऊँच-नीच या छुआछूत पर करते बहुत बुराई थे ।।

अन्यायी तो कायर होता हमको यही बताते थे।
अन्यायी से लड़ना हमको प्रतिदिन ख़ूब सिखाते थे।
बिना लड़े ही हारा हो फ़िर सम्मुख घुटने टेके हो ।
अन्यायों को सहन किया जो उस पर रोष दिखाते थे।।

चरण वंदना पापा जी की पुनि पुनि शीष नवाता हूँ।
पास नहीं वह आज हमारे फ़िर भी जीता जाता हूँ।
प्रखर समस्या चोला ओढ़े रोज़ सुबह जब आती है।
पापा जी की रीति नीति से विजय श्री को पाता हूँ।।

शब्द वाक्य की सीमा ऊपर सबके पापा होते हैं ।
जिनके पापा जीवित देखो नींद चैन वह सोते हैं ।
दूर समस्या खड़ी झांकती पापा जी ढँकते रहते ।
जिनके पापा आज नहीं हैं चुप-चुप छुप-छुप रोते हैं।।

-सत्येन्द्र पटेल’प्रखर’
फतेहपुर
उत्तर प्रदेश
212601

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