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देख कर फिर सघन जलधर

देखकर फिर सघन जलधर
विकल बरसे नयन झर-झृर
सूखते से पादपों ने
मौन रहकर सब सहा है
अधखिली कलियों प्रतिपल
आस भर-भर कर कहा है
खिल उठे फिर प्रेम-मधुबन
अश्रु बरसो आज निर्झर । देखकर….
वेदना के गीत की यह
मधुर धुन किसने सुनाई ?
चाह की परिकल्पना में
मूर्ति मञ्जुल क्यों बनाई ?
क्यों किया श्रंगार अनुपम
कामना ने रूप धर-धर ?देखकर …
हम चले थे नभ से लेकर
मन में सुन्दर सप्त-घेरे
दिन सुखद अब रात में हैं
खो गये वह पंथ मेरे
प्रेम-दीपक आज जलना
साथ मेरे आह भर-भर
देखकर फिर सघन जलधर, विकल ….

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