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दूर क्षितिज के पार

माँ! चल ले चल तू मुझे,दूर क्षितिज के पार।
जहाँ हृदय हो पुष्प सा, स्वार्थ हीन हो प्यार ।।

इंसा में इंसानियत,हो निर्मल व्यवहार।
सत्य सुर्य सा हो प्रखर,करे झूठ पर वार।।
जहाँ स्वर्ग सी हो धरा,खुशियों की बौछार।
माँ! चल ले चल तू मुझे,दूर क्षितिज के पार।।

शब्द सुरीले हो अधर,वीणा की झनकार ।
चंदन सी महके हृदय,दिल में प्रेम अपार।।
जहाँ कभी होती नहीं, नफरत की दीवार।
माँ! चल ले चल तू मुझे,दूर क्षितिज के पार।

कोमल मन पर भय यहाँ, करता नित्य प्रहार।
गूँज रहा है कर्ण में, जग का हाहाकार।।
निज आँचल में लो छुपा,कर लो स्नेह दुलार।
माँ! चल ले चल तू मुझे,दूर क्षितिज के पार।।

चल पलकों को मूँद कर,करे स्वप्न साकार।
स्वप्न सुनहरा खोल दो,इन्द्रधनुष का द्वार।।
चाँद सितारों से सजा, परियों का संसार।
माँ! चल ले चल तू मुझे,दूर क्षितिज के पार।।
-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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