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1 May 2018 · 1 min read

दर्पण

झूठ बोलता है
दर्पण
हम जो दिखते हैं
वो हैं कहाँ
दर्पण दर्प से चूर
और तुम गर्व से
कभी फुर्सत में देखना
दर्पण
तुमको तुम्हारे अक्स
बिखरते दिखाई देंगे
तुमको अपना ही
सौंदर्य काटेगा
तुम्हारे माथे पर पड़ी
गर्वित रेखायें कहेंगी
इतराओ और इतराओ
इठलाओ और इठलाओ
अभी समय जिंदा है
मैं भी जिंदा हूँ और
देखो दर्पण भी जिंदा है
वक़्त के साथ तुम भी
बदल गए
ये दर्पण भी झूठ बोलने लगा
कैसे जान सकोगे तुम
सच्चाई
अंतरात्मा घर्षण से दूर
और तुम दर्पण में चूर।
इसलिये कहता हूं मैं
न देखा करो दर्पण।
वो बोलता है झूठ
नही करता सत्य का
संधान
वो दिखाता है वो
जो तुम देखना चाहते हो
असत्य पर सत्य का वर्क
देह नेह का ऋत आवरण।।
जिस दिन दर्पण दिखाने लगेगा
तुमको तुम्हारा मानस
भूल जाओगे देखना
दर्पण….सच यही है प्रिय
दर्पण झूठ बोलता है।
* सूर्यकान्त द्विवेदी

Language: Hindi
410 Views
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