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25 Jun 2023 · 21 min read

दरोगवा / MUSAFIR BAITHA

कहानी

दरोगवा
^^^^^^^/ मुसाफ़िर बैठा

पिछड़ों, अति पिछड़ों व दलितों की पूरी आबादी वाला उतरी बिहार के नेपाल से सरहद साझा करते एक जिले का धुर पिछड़ा एक गांव। गांव में दबदबा दलितों – पिछड़ों की आबादी बीच अगड़े ग्वालों का। ग्वाला माने यादव। घुमा के बूझिए तो लालू, मुलायम, शरद वाला यादव। ‘भूराबाल’ (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) जैसी दबंग व पेचोंखम रखने वाली माने जाने वाली कौम की छटाँक भर भी उपस्थिति नहीं थी इस गांव में। हालांकि ‘भूराबाल’ की गैरमौजूदगी में उनके ‘सांस्कृतिक’ आचरणों को अंजाम देने का जिम्मा यादवों के ही हवाले था! इस ख्याल से यादवों का एक कुनबा खास मौज में था। कुनबे के लोग अक्सर इन ‘सांस्कृतिक’ कर्मों का दत्तचित्त अपना निर्वहन किया करते थे। स्वजाति हो या विजाति, कमजोर गरीबों की राह में नित कांटे उगाए बिना इनका जी नहीं भरता था। हां, अपने जात भाइयों के कमजोरों पर इतना लाड़-प्यार जरूर उमड़ता जब गैर जात वालों पर अपनी बिरादरी को तरजीह देने का मामला आता, अपनी जात की नाक-रक्षा का जब सवाल आता। मसलन, लड़ाई-झगड़े के मौकों पर सही ग़लत का खयाल किये बिना ये स्वजातीय ग्वालों का पक्ष लेते। कुल मिलाकर, गांव में जाति प्रपंच, सांस्कृतिक लठैती एवं अन्यायकारी बरजोरी के तमाम कुकर्म एवं धत्कर्म कर ये बदगुमान ग्वाले बराबर असहज व तनाव का वातावरण बनाए रखते।

गांव के नाभि बिंदु से अलग थलग कुछ दूरी पर अवस्थित थी मुसहरों, चमारों एवं डोमों की समावेशी टोली। हालांकि इनके भी जाति-खांचे अलग थे। ये दलित जातियां भी एक दूसरे से या तो छोटी थी या बड़ी। यानी, तीन जातियों के इकट्ठे टोले में भी खाँचाबद्धता थी। इस टोले के डोम वास वाले हिस्से के एक भूमिहीन मजदूर परिवार में जन्मा था दरोगवा, जिसकी यह कहानी है। वैसे, निर्धनता और भूमिहीनता का पर्यायवाची था यह समूचा टोला ही। टोले में भी एक प्राइमरी स्कूल के खुल जाने से बच्चों में अब अक्षर-ज्योति फैलने लगी थी। वैसे, सच तो यह भी था कि अधिकांश बच्चे स्कूल की देहरी पर खिचड़ी-लोभ में खिंचकर जाते। सरकार का यह खिचड़ी कार्यक्रम नायाब था। हर दिन स्कूल में खिचड़ी और चोखा ही मिलता। जिस समय खिचड़ी बंटनी होती, खेतों में घोंघा, सितुआ बीनने गए बच्चे भी कतार में आकर बैठ जाते। खिचड़ी अगर बच जाती तो दो चार बड़े बुजुर्ग लोगों की क्षुधापूर्ति भी हो जाती थी जो इसी आस में स्कूल के अहाते में थाली लेकर टकटकी लगाए खड़े रहते। खिचड़ी की क्वालिटी का तो पूछना ही क्या? बिना किसी सावधान साफ-सफाई के अन्यमनस्क मन से सिझाई गयी इस खिचड़ी में दो-चार मरे घुन किस थाली में तैरते न मिलते? किसी ने सब्र-सावधानी से खाया तो ठीक, वरना घुन भी पेट के अंदर! जैसे घुन लगी जिंदगी में मरे घुन की उपस्थिति भी जरूरी हो! खैर, अब खिचड़ी-पुराण बंद, आइए, कथानायक दरोगवा के घर चलें!

दरोगवा के माता-पिता मृत जानवरों की खाल उतारने एवं बांस-बेत से पटिया, बेना, डलिया देउरा आदि छोटे-मोटे घरेलू सामान बनाने का काम कर परिवार के तीन पेट पाल रहे थे। कभी कभार खेतों में उसके पिता को मजदूरी करने को भी मिल जाता। किसी काम में अगर दबंग ग्वालों का स्वार्थ आड़े आता तो बिना मजूरी के अथवा बिना उचित मजूरी के भी काम करना पड़ता। इस जोर-जबरदस्ती के आगे ‘चूं’ बोलना भी शेर के मुंह में हाथ डालना होता। धन-बल के तड़का के मणिकांचन संयोग के इस जोर के दर्द को दरोगवा के माता-पिता ने खूब भोगा, सहा, बिना चूँ-चपड़ किए। और यही वजह थी कहीं न कहीं कि उसके पिता ने ‘दरोगा’ नाम रखा उसका। मां-बाप के मन के किसी कोने में बेटे को दारोगा बनाने की साध थी कि सब किसी की ऐंठ पर उनकी मूछों की ऐंठ, बजरिये पुत्र-पराक्रम, तो किसी दिन भारी पड़े!

सो, दरोगा प्यार-मनुहार से सोच-समझकर सपनों से जोड़कर रखा गया नाम था। इस ‘ओजस्वी’ नाम की कद्र गांव वालों ने कभी न की। जैसे गरीब की जोरू गांव भर की भौजाई बन जाती है, वैसे ही दारोगा की विपन्नता ने उसके नाम की शुचिता को भी नहीं बख्शा और ‘दरोगा’ सामूहिक ‘बलात्कार’ का शिकार होकर ‘दरोगवा’ के तिर्यक विकारग्रस्त रूप में हर जुबान पर व्याप्त हो गया। हालांकि उसके मां-बाप ने काफी दिनों तक अपने बेटे के ‘दरोगा’ को अक्षुण्ण रखने का भरसक प्रयत्न किया पर उन्होंने भी एक दिन हार मान ली और समाज-बलत्कृत ‘दरोगवा’ शब्द को बुझे मन से अपना लिया। मन को समझाया कि लोगों ने जब ‘दरोगा’ की जगह ‘दरोगवा’ को हैसियत(!) प्रदान कर ही दी है तो हमें भी उसे अपना लेने में क्या हर्ज! हालांकि स्कूल के रजिस्टर एवं घर के कागज-खतियान में ‘दरोगा’ का अस्तित्व बरकरार रहा। एक समय ऐसा आया कि दरोगा अपना बिगड़ा नाम सुनने का अभ्यस्त हो गया। दरोगा का असर उसके दिलो-दिमाग पर इस कदर हावी हो गया था कि एक दो मौकों पर तो उसने प्रथम परिचय में अनजान लोगों तक को अपना नाम दरोगवा ही बता डाला था और फिर झेंपते हुए तुरंत अपना नाम सही किया था। बार-बार का थोपा गया गया झूठ सच का गला दबा उस पर चढ़ बैठता है। ऐसा ही झूठ को सच में तब्दील करने का हिमायती निरंकुश जर्मन शासक हिटलर का प्रचार मंत्री गोएबल्स भी था। पीयरलेस इंग्लिश राइटर शेक्सपीयर कहते हैं, नाम में क्या रखा है? अगर वे भारत की ‘दिव्य’ भूमि पर अवतरित हुए होते, वह भी एक गरीब दलित कुल में, तो यकीनन उन्हें पता चल जाता कि नाम में क्या नहीं रखा होता है, कि नाम में क्या क्या रखा होता है!

गांव-देहात में पुलिस-दारोगा का भय एवं असर सिर चढ़कर बोलता है। प्रभु लोगों को भी जब इनकी शरण गहने आना होता है या ये प्रभु वर्ग की सेवा में जाते हैं तो शेर के आगे प्रभुत्व उड़न छू हो जाता है! गोया, ऊंट को ख़ुद के पहाड़ के नीचे आने का पता चल गया हो! लेकिन दरोगवा का इस ओजवृत्ति से कभी कोई लगाव नहीं दिखा। उस पूत के दारोगा-उदासीन पाँव पालने में ही दिख गए थे। गांव-जवार, पास-पड़ोस के हमउम्र बच्चों एवं स्कूली संगी-साथियों के साथ रार मचाने या टंटा खड़ा करने जैसे उपालंभी कार्यों की कोई गवाही दरोगवा के विरुद्ध नहीं मिलती। उसके मां-बाप को डांट-डपट करने एवं लोगों की करने एवं लोगों की शिकायत पाने की एक भी मुराद पूरी न हुई होगी! दारोगे के प्रैक्टिकल गुण-धर्म को व्यंजित कर सकने वाला कोई फल इस दरोगवा में नहीं मिलता। दरोगवा का मन-झुकाव कहीं और था। वह तो डॉक्टरों की जनसंलग्नता और सेवाभाव का मुरीद था। और, इसी बात को लक्ष्य कर उसने अपने मां-बाप की इच्छा-आकांक्षा को रौंदकर अपने गांव के कोई पांच मील दूर स्थित एक शहर, जिला मुख्यालय में आईएससी, जीव विज्ञान में नामांकन करा लिया। उन्हीं दिनों अपने किसी साथी सहपाठी के कहने पर उसने सरकारी कॉलेज से डिप्लोमा इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए आयोजित राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षा दी जिसमें वह पास भी हो गया। गांव घर वालों की कूपमंडूक बुद्धि के हिसाब से ओवरसीयर बनने का यह बड़ा अवसर था। गांव में अब तक अच्छी कमाई वाली नौकरी किसी की नहीं लगी थी। दरोगवा के लिए तो यह पढ़ाई पूरी अच्छी कमाई के साथ-साथ ऊपरी कमाई की छौंक का स्वाद भी चखने का मौका देने वाली थी। गांव में उंगली पर गिनने लायक लोग ही नौकरी वाले थे। ऐसे में गांव के उसके तमाम हितैषियों ने एक स्वर में उसे पॉलिटेकनिक की पढ़ाई करने की बिन मांगी सलाह दी और पढ़ने की आर्थिक व्यवस्था भी कर दी। उसे लोगों के दबाव के आगे झुकना पड़ा। उसे डॉक्टर बनने की अपनी चिर संजोई इच्छाएं मन में ही दफन कर देनी पड़ीं। अब गांव को अपना पहला ओवरसीयर यानी जूनियर इंजीनियर मिलने वाला था। मां बाप ने एक बेटे से लगे अपने दारोगा के सपने को परिस्थिति के अनुकूल इंजीनियर में तब्दील कर लिया था!

दरोगवा भले ही अपने मन का कैरियर नहीं चुन पाया था, अब वह थोपे कैरियर में ही अपनी खुशी तलाशने लगा। कहा भी गया है, आदमी खुशी खोज लेता है। पॉलिटेकनिक कॉलेज के नामंकन टेबल पर पहुंचते-पहुंचते वह काफी रोमांचित था। मन में असंख्य सुखद कल्पनाएं उथल-पुथल मचा रही थीं। नामांकन की प्रक्रिया संपादित हो जाने के बाद क्लास शुरू होने एवं अन्य जानकारी लेने के लिए प्रफुल्लित मन वह पूछताछ काउंटर की ओर ज्यों बढ़ा कि उसे किसी ने उसके कंधे पर बल देकर उसे अपना अनुसरण करने का इशारा किया। माजरा क्या था, यह उसकी समझ से परे था। पर पूछने की हिम्मत भी न थी। संकेत को पकड़कर कॉलेज की बिल्डिंग की छत पर जाने को था जो उस समय तक अबूझ था। नामांकन कक्ष से बिल्डिंग के सीढ़ीघर से शुरू होने वाली पहली सीढ़ी तक कोई पचास-पचपन कदम उन दोनों को चलना पड़ा था। इन पचास-पचपन कदमों के नापने में गुजरे वक्त ने दरोगवा की एक बड़ी मुश्किल आने से पहले ही खत्म कर दी थी। इसी बीच मरी आवाज में उस आदमी ने फुसफुसाया था- “अजी बालक, तुम्हारा क्या नाम है?” पहले तो दरोगवा अपना नाम कहते हुए सकुचाया था और झेंपते हुए अपना नाम ‘दरोगा’ बतलाया था। अगली बार उस आदमी की जो आवाज आई उसमें ठंडापन कम था और आवाज की ‘पिच’ कुछ तेज थी। स्वर भी आदेशात्मक और कड़ा था- “अपना पूरा नाम बताओ?” “दरोगा डोम” बताते हुए वह उस आदमी के साथ तीन चार सीढ़ियां लांघ चुका कि दरोगवा कि उस आदमी ने उसे वापस लौटने का संकेत किया। दरोगवा को एक एकांत कोने में ले गया और अगल-बगल झांककर यह इत्मीनान कर लेने के बाद कि किसी के कान यहां तक नहीं पहुंच सकते, हौले से बताया- “सुनो बाबू दरोगा! मैं भी तुम्हारी जाति से हूं, सेकेंड ईयर का स्टूडेंट हूँ। जाओ ग्राउंड फ्लोर के कमरा न. 4 में बैठना।” कमरे की चाभी उसने थमा दी थी। यह कमरा छात्रावास की निचली मंजिल पर स्थित था। छात्रावास कॉलेज भवन के करीब दो सौ मीटर उत्तर में था। दरोगवा को बाद में पता चला कि उस व्यक्ति की ड्यूटी ‘फ्रेशर्स’ को नामांकन के तुरंत बाद कॉलेज की छत पर पहुंचाने के लिए गाइड करने की लगी हुई थी जहां सेकेंड ईयर के बहुतेरे छात्र जमा थे और ‘इंट्रोडक्शन’ के नाम पर फ्रेशर्स को बारी-बारी से बुलाकर उल्टे सीधे प्रश्न पूछ एवं आदेश कर काफी परेशान कर रहे थे। उस भलेमानस सीनियर गंगा डोम ने दरोगवा को अपने प्रत्युत्पन्नमतित्व और हमदर्दी से रैगिंग के विकट तमाशे का हिस्सा बनने से बचा लिया था। यह भाग्य(!) दरोगवा का कि भोला मन एवं नेकदिल गंगा डोम को रैगिंग प्रक्रिया के शिलान्यास चरण में ही लगा दिया गया था। दरोगवा अपने बैच का अकेला शख्स निकला जो डोम जाति का था और स्वजातीय गंगा की तरफदारी की वजह से रैगिंग से बच गया था। गंगा को समय ने अपनों, अपने जैसों की खातिर बाजीगरी करना सिखा दिया था। दरोगवा खुद जब रैगिंग लेने की हैसियत में आया तो अपने अविकारी चित्त के बावजूद रैगिंग वाली टीम का सक्रिय हिस्सा ही बनाया गया। रैगिंग-शिलान्यास की भूमिका ग्राउंड फ्लोर के नामांकन के टेबल से फ्रेशर्स को पहुंचाने की कुछ दूसरे छात्रों की रही। रैगिंग में अन्य बैचमेट के बेहद अश्लील, उटपटांग प्रश्नों से अलग दरोगवा के प्रश्न हर कैंडिडेट के लिए अलग होते थे और वे सवाल रोचक, चतुराई भरे, अभ्यर्थी के ज्ञान और प्रतिभा को मापने वाले थे। और, प्राय: उसके प्रश्नों से ही हर फ्रेशर्स की रैगिंग का अंत होता था जिससे अंततः रैगिंग का शिकार होने वाले अभ्यर्थी को लौटते-लौटते कुछ राहत भरा सुखद एहसास भी मिल जाता था। कुछ दिनों बाद रैगिंग की एक प्रक्रिया हॉस्टल में भी संपन्न होती थी। पर कॉलेज की छत वाले कैंपस रैगिंग और छात्रावास की रैगिंग में कुछ मूलभूत और स्पष्ट अंतर थे। छात्रावास की रैगिंग जहां अपने-अपने जाति-जमात गुट के सीनियर्स द्वारा ही की जाती वहीं एडमिशन के वक़्त के कैंपस रैगिंग में दलित, पिछड़े, सवर्ण सभी इकट्ठे मिलकर रैगिंग करते थे। कैंपस की रैगिंग में जाति की शिनाख्त होने पर, जो हो ही जाती थी, विरोधी जाति पक्ष के सीनियर द्वारा अधिक परेशान करने वाले प्रश्न और व्यवहार किए जाते थे, खासकर सवर्णों द्वारा। छात्रावास की रैगिंग में भयावहता कम होती थी और इसमें कहीं अपनापन का पुट भी होता था। अपने गुटीय जूनियर की रैंडम रैगिंग लेने का भी चलन था। यह गुटीय सीनियरों द्वारा आहूत आपात बैठकों में लिए गए निर्णय के तहत होता था ताकि जूनियर्स अपनी सीमा में रहें, सीनियरों के साथ सम्मान का व्यवहार करें। रैंडम रैगिंग का एक ध्येय जूनियर का रणनीतिक प्रशिक्षण एवं सदाचरण की सलाह देना भी होता था। एक जूनियर के साथ हुए रैंडम रैगिंग का प्रसंग काफी रोचक है। रामलाल मोची किसी गांव से आया था। फर्स्ट ईयर में पढ़ने के समय ही उसकी शादी कर दी गई थी। स्थानीय परंपरा के अनुसार शादी के दो दिन बाद ही उसकी नई-नवेली पत्नी मैके लौट गई थी और रामलाल पढ़ाई करने शहर स्थित इस कॉलेज में आ गया था। इधर नया पढ़ने की भूख, उधर शादी के बाद कुछ नया पाने की भूख! पढ़ने की भूख पर पाने की भूख भारी पड़ रही थी! मिलन हुआ भी था तो क्षणिक और लम्बी लगती जुदाई हो गई थी। इस जुदाई ने उसे बाजार में मुंह मारने को उद्धत कर दिया था जो कॉलेज की बाजू में ही संयोग से उपलब्ध था।

गर्मी के दिन थे। फाइनल ईयर इस बहुजन छात्रों का एक जत्था शहर में ‘राम तेरी गंगा मैली’ का छह से नौ बजे वाला इवनिंग शो देख कर लौट रहा था। कॉलेज की दीवार से सटे ही कुछ कोठेवालियों के फूस के घर थे। उन घरों की बगल से GT रोड गुजरती थी। जाहिर है, भाड़े के ट्रक, लॉरी, जीप आदि के ड्राइवर ही अधिकतर उसके ‘स्वाभाविक’ एवं नियमित उपभोक्ता रहे होंगे। लेकिन सीनियर के जत्थे ने उस बदनाम गली से एक जानी पहचानी सूरत को इधर-उधर झांकते हुए और हड़बड़ाते से निकलते देखा। वह कोठे की छाँह से निकल चुका था, उसकी चोरी रंगे हाथों पकड़ी गई थी। छुपने-छुपाने का कोई अवकाश न था। जत्था कॉलेज की फील्ड में आकर रुक गया था और जत्थे से किसी ने रामलाल को पास आने का संकेत किया था। वह डरे-सहमे कदमों से कछुआ गति से आगे बढ़ा। किसी ने डपटा, “अरे बरगाहीभाई, झटक के आता है कि…”वह शेर की मांद की जानिब अपने तईं तेज चल कर आगे बढ़ा, पर गति अब भी धीमी ही थी, कदम आगे बढ़ने से मना कर रहे थे, फ्रिज से हो जा रहे थे। डांट वाली आवाज़ ही फिर से मुखातिब थी-“अबे बपचोदी भाई की औलाद, क्या करने गया था उधर?” आवाज में अधिकारपूर्ण गुस्सा था और आंखों से प्रश्न पूछता इशारा वेश्यालय की तरफ। रामलाल को काटो तो खून नहीं, जुबान से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी। वह हकलाते हुए कुछ अस्फुट सा बोल सका, ” जी हम्मsss…।” अच्छा चलो होस्टल, तुम्हारी सुरसुरी दूर करते हैं”, पुनः वही आवाज़ थी। और, उस आवाज को ताल देता ‘हा हा’ की समवेत आवाज के साथ छात्रजत्था आगे बढ़ चला। रामलाल उनसे पिछड़ता पर हॉस्टल की ओर की ओर भारी कदमों से किसी तरह बढ़ सका था। हॉस्टल में फौरन आपात मीटिंग बुलाई गई। मुजरिम जज की बेंच के सामने हाजिर हुआ। सवाल उलटे सीधे भी हुए मगर दरोगवा ने जो सवाल किये वो रामलाल को राह दिखाने वाले थे, तंग करने वाले नहीं, मजा – मस्ती की गरज से पूछे गये नहीं। मसलन, दरोगवा ने ‘मुंहमारी’ के नुकसान गिनाए, पत्नी से वफादारी का वास्ता दिलाया। पत्नी से गाहे-ब-गाहे जाकर मिल आने की सलाह दी। लेकिन एक सीनियर, जो अपने समय में रगड़ा कर रैगिंग खाई थी, उसे कड़ी सजा दिलवाने की जिद रखे हुआ था। रामलाल को केवल अंडरवीयर पर करवाया गया और उसके गले में पट्टी बांधकर अपने गुट के सारे अंतेवासी छात्रों के कमरों में घुमाया गया। पट्टी पर लिखा था, “मैं रामलाल हूं। अभी-अभी बगल से मुंह मार कर आया हूं। बड़ा बेशर्म हूं मैं, मेरे मुंह पर जूता मारिए।” पीछे को बंधे हाथ, शर्मसार वह यह सब करने को मजबूर था। फिर आगे ऐसी घटना करने की जुर्रत कौन करता?

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इंजीनियरी जैसे रचनात्मक पाठ सीखने-सिखाने आए लोगों की ध्वंस-बुद्धि को देख दरोगवा चकित था। जिंदगी का, पढ़ाई-लिखाई का ऐसा भी रंग हो सकता है, उसने सपने में भी नहीं सोचा था। दरोगवा के लिए यह सब देखना सिर मुड़ाते ओले पड़ने की स्थिति में पड़ने की बात थी। ऐसा भी नहीं था कि भेद बुद्धि एवं व्यवहार रखने वालों से पूर्व में उसका सबका न पड़ा हो। उसके अपने गांव के कई लोग तो औरों की ज़ाती ज़िन्दगी में खलल पैदा करने वाली कितनी ही हरकतें किया करते थे। यह यहां कॉलेज में तो उसने जातिभेद का अलग नंगा रूप देखा था। अवर्ण-सवर्ण के खांचे में नाभिनालबद्ध छात्र और शिक्षक के ‘तू डाल-डाल मैं पात-पात’ की स्वाभाविक अथवा थोपी दैनंदिनी (स्थिति अनुसार) देख उसे काफी हैरत होती थी। दुनिया के सात अजूबों के बारे में उसने सुन रखा था, देखा नहीं था। लेकिन यह जाति का दंगल जो उसकी आंखों के सामने हो रहा था, शर्तिया उसके लिए आठवें आश्चर्य से कतई कम न था।

छात्रावास की रीति-नीति-गति से बावस्ता होने पर दरोगवा को कई नायाब तथ्यों के बारे में जानकारी हुई। एक ओर था सवर्ण छात्र-शिक्षकों का खेमा तो दूसरी तरफ दलित-पिछड़े समाज के छात्र-शिक्षकों का गुट, और इन प्रतिद्वंद्वी खेमाबंदियों के बीच सैंडविच बनते-पिसते अल्पसंख्यक छात्रों का एक गुट उदासीन कोटरा। यह कोटरा दोनों खेमों का विश्वास अर्जित करने में असफल था, क्योंकि उन पर प्रतिपक्षी ख़ेमे के लिए जासूसी करने का, जुगलई करने का आरोप मढ़ा जा सकता था। इस कोटरे के छात्र अजीब डायलेमा में पड़े ‘न घर का न घाट का’ की असुविधा-असहजता की विकट स्थिति झेलने को अभिशप्त थे।

दरोगवा ने अपनी नंगी आंखों के सामने गोली-बम चलाते लोगों को पहली दफा कॉलेज परिसर में यहां ही देखा था। एक बार अहले सुबह प्रतिद्वंद्वी गुट ने हमला बोलकर पिछड़े गुट के ‘बॉस’ के रूम में घुसकर लात-जूतों एवं डंडों-रॉडों से धुनाई कर दी थी। यह छुट्टियों का समय था जब छात्रावास में कम ही छात्र थे। उनकी इतनी निर्मम गहरी पिटाई हुई थी कि हाथ-पैर की कई हड्डियां चटक गई थीं और उन्हें कई हफ्तों तक अस्पताल में रहना पड़ा था। लेकिन प्रतिक्रिया भी इस क्रिया की खूब हुई थी, न्यूटन के गति नियमों के तीसरे नियम की रक्षा करते हुए! घटना को अंजाम देकर सावधान सवर्ण तो अधिकतर घटना के समय ही भाग गए थे पर उनके बहुत सारे सामान उनके कमरों के ताला तोड़कर आहत पक्ष की ओर से लूट लिए गए। गुटबाजी से दूर रहने वाला एक सरल से सुधुआ ब्राह्मण छात्र स्थिति की नजाकत को नहीं भांप पाया, उस निरपराध को पिछड़े गुट के गुस्से की बलि चढ़नी पड़ी। उसको पकड़ कर आवेशित लड़कों ने बेतरह पीटा और उसके दोनों हाथ के पंजे मार-मार कर कुचल दिए। लगे हाथ उस पर चोरी-मारपीट करने में शामिल होने का आरोप भी पुलिस में दर्ज़ एफआईआर में मढ़ दिया गया। हालांकि उस पर यह आरोप प्रभावित गुट द्वारा अपने बचाव में ही किया गया था कि मारने-पीटने की कोई वजह भी तो हो।

युद्धाक्रमण से द्विज पक्ष कितना भयभीत रहता था, यह हमारे सूत्रों से ज्ञात नहीं है, चूँकि उनका मत लिया नहीं जा सका, मगर पिछड़ा गुट पर्याप्त डरा-सहमा रहता था। हमले की आशंका बलवती होने पर मिर्च पाउडर के पैकेट हर कमरे में रखे जाते ताकि हमलावर की आंखों में इसे झोंक कर आत्मरक्षा की जा सके। एक बार में मिर्च की जोरदार खरीदारी होते देख किराना दुकानदार भी चौंक जाता और इस खरीदारी पर प्रश्न करता। खरीदार छात्र को कोई निबटाऊ- चलताऊ जवाब देकर पल्ला झाड़ना पड़ता। हालांकि दुकानदार छात्रों के हाव-भाव को देखकर माजरे का अनुमान कर लेता। नलकटुआ, रिवॉल्वर, पिस्टल जैसे संजीदा और संभाल कर रखे जाने वाले गुह्य धन हमारे गुट के विशेषज्ञ हाथों के हवाले रहते। चाकू-छुरी-कटारी, रॉड, लौहदण्ड (छड़), छड़ी-लाठी वगैरह का भी इंतजाम रहता कि पता नहीं कब इन वैकल्पिक अस्त्र-शस्त्रों को भी सेवा करने का अवसर मिल जाए!

इन तकनीकी संस्थान में जो गुटबंदी व्याप्त थी उसका अपना समाजशास्त्र था, अलग समाजशास्त्र था। इस समाजशास्त्र को जानने के लिए कुछ डेटाबेस की जरूरत होगी। कॉलेज के इन गुटों को अपने-अपने बाहरी हित समूह से भी अवलंब मिलता था। इलाके में चतुर्दिक ‘भू’ धातु का वर्चस्व था। इस प्रभाव में छात्रों के सवर्ण गुट ने भूमिहार लीड रोल में। पिछड़े गुट की नकेल शहर व आसपास के इलाके में प्रभावकारी दखल रखने वाले पासवान (दुसाध) छात्रों के हाथों में थी। दरोगवा का आकलन था और यह सही आकलन था कि संगठित आक्रामक और मनबढू सवर्ण गुट के बरअक्स पिछड़ों का खेमा काफी कमजोर था और बिखरा-बिखरा भी। और इसका एक बड़ा कारण सवर्ण-अवर्ण छात्रों की परिवेशगत और आर्थिक पृष्ठभूमि में बड़ी खाई होना भी था। पिछड़ा गुट महज सवर्णों के आक्रामक रवैया के प्रतिक्रिया स्वरूप आत्मरक्षार्थ उभरा था। पिछड़ा गुट के जो इने गिने शिक्षक-कर्मचारी थे वे गुटीय सहानुभूति रखने के बावजूद किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे, खुलकर सामने आने से डरते थे। दलित प्राध्यापक और कर्मचारी तो खैर, वहां कोई था ही नहीं। सवर्ण शिक्षक एवं कर्मियों तथा स्थानीय बदमाशों की शह पाकर सवर्ण गुट का बेजा वर्चस्व था वहां। ये लोग दलित-पिछड़े तबके के छात्रों पर हमेशा रौब गांठने और नीचा दिखाने की ताक में रहते थे।

‘फूट डालो और राज करो’ के शासन तंत्र को अंग्रेजों की आमद कौन कहता है! धर्म और जाति भेद के गंदे परनाले में गहरे धंसे हमारे सामंती ब्राह्मणवादी मानस समाज का प्रभुत्वशाली तबका तो हज़ारों वर्षों से हमें बंटता आया है। विगत और वर्तमान के हमारे सारे देवी-देवता, धर्मपुरुष-महापुरुष, बुद्धिजीवी-मनीषी जनों के लिए भी इस चुनौती से पार पाना संभव न हुआ। अभी हमारे बिहारी समाज में सवर्ण वर्ग, खासकर ‘भू’ तत्व इस नीति आयोजन में सर्वाधिक सफल हैं। दरोगवा को इस कूटनीति का सबसे बड़ा पहला प्रत्यक्ष नजारा कॉलेज के पहले दिन के पहले पीरियड में ही लग गया। कॉलेज के पहले दिन क्लास करने का आम छात्रों की तरह उसे भी बेसब्री से इंतजार था। उत्साहित-उल्लसित दरोगवा जब कक्षा के अंदर दाखिल हुआ तो ब्लैक बोर्ड पर कुछ मोटे मोटे हर्फ़ स्वागत करते मिले – “आगे की बेंच पर केवल एफ.सी. ही बैठेगा। कोई बी.सी. नहीं बैठेगा। जो इस बात का उल्लंघन करेगा उसके साथ बुरा होगा।” जाति प्रपंच या जाति दंश से दूर रहे(!) पाठक गण यह जान लें कि एफसी मतलब फॉरवर्ड कास्ट होता है और बीसी माने बैकवर्ड कास्ट। ये शब्द कैंपस में इतने चलते थे जितने कि बिजी रोड पर गाड़ी-घोड़े! कथित विद्या देवी, सरस्वती के ‘साक्षात’ मंदिर के गर्भ-गृह में यह अलबेला चेतावनी-आदेश पढ़कर एक क्षण को दरोगवा भकुआ गया। उसे लगा कि वह एकलव्य है और उसका अंगूठा काटने की तैयारी चल रही है। उसे लगा कि कोई गर्म शीशा पिघलाकर उसके कर्ण-छिद्रों को भरा जा रहा है। ऐसे ही कई विचार उसके दिमाग को झंकृत कर रहे थे कि तभी किसी ने पीछे से उसे धक्का दिया तो उसकी तंद्रा टूटी। धक्के की तरफ सिर मोड़ कर ताका। धक्का मारने वाला उसकी बगल में बैठा था, उसने कंधे से धक्का दिया था, और, दरोगवा की ओर देख कर खीं खीं कर हंसते हुए अपनी मुंडी और कड़क आंखों के इशारे कम उसे पीछे जा कर बैठने का इशारा किया था। जबकि वह तो ब्लैकबोर्ड पर लिखी इबारत पढ़कर पीछे की बेंच पर बैठने जाने वाला ही था, धक्के ने उसे सेटबैक देने के साथ उसके कदमों को बैक बेंच की तरफ खींचने में कैटेलिस्ट का काम किया था। दरोगवा ने फौरन अंतिम बेंच की राह पकड़ी। कुछ देर पहले जो रोमांच, जो उत्साहातिरेक उसको आंदोलित कर रहा था वह अबतक काफूर हो चुका था। बेंच पर बैठने के बाद भी उसके हाथ-पांव थरथरा रहे थे। यह श्याम पट पर दर्ज़ किया गया ‘मानीखेज़’ आलेख शायद जांच भी था, बहुजन वर्ग के छात्रों की औकात की। घटनाक्रम के बीच, एक औसत से भी काफी कम, कोई पौने पांच फीट का श्यामपटवर्णी छात्र, जो कसरती बदन का था और दूधिया रंग की सफारी सूट में था, कमरे में दाखिल हुआ था। वह श्यामपट्ट पर लिखे उन चेतावनी के शब्दों पर नज़र डालते हुए प्रथम बेंच के बीचोंबीच में जा बैठा। वह मुंह में गुटखा चबा रहा था। उसने सरसरी निगाह से अगल बगल बैठे छात्रों को देखा और बैठने के मिनट के भीतर ही उठकर सधे कदमों कम सीना ताने सैनिक की भांति ब्लैकबोर्ड की तरफ बढ़ चला। दरोगवा को लगा कि वे कदम सियाराम पासवान के न होकर मिथकीय अंगद के पांव हैं। जिनकी यह पहली घण्टी थी उन प्राध्यापक महोदय का पधारना अभी शेष था। प्रोफेसर की टेबल पर रखी खल्ली और डस्टर को सियाराम ने उठाया और एक गहरी हर चेहरे को पढ़ती निगाहें क्लास में उपस्थित सारे छात्रों की जानिब डालते हुए ब्लैकबोर्ड की तरफ़ मुखातिब हुआ और चेतावनी की लोकतंत्रमर्दक इबारत को मिटाकर उसकी जगह ख़ूब बड़े-बड़े हर्फ़ों में लिख डाला- “अगली बेंच पर बी.सी. भी बैठेगा, जो आगे आएगा वह बैठेगा। है कोई माई का लाल जो रोक सके?” दरोगवा का चेहरा अब फिर से हरा हो गया था। उसे नई इबारत लिखने वाले सियाराम के हाथ राम कथा के बाहुबली पात्र हनुमान की गदा में तब्दील होते प्रतीत हुए। कुछ पल को क्लास में पिन ड्रॉप शांति व्याप्त रही। एकदम मरघट सा निःशब्द-स्तब्ध था क्लास कि प्रोफेसर की एंट्री हुई। इस आगमन से शांत झील में पड़े पत्थर का प्रभाव हुआ। शिक्षक ने भावशून्य रहकर ब्लैकबोर्ड पर लिखी इबारत मिटा थी। कोई पूछताछ भी न की इस बाबत। उसकी नजरों में शायद, कुछ भी अस्वाभाविक नहीं हुआ था। और इस तरह से फ़र्स्ट ईयर के फर्स्ट पीरियड में ही एस्टीमेटिंग के इस क्लास से जैसे कॉलेज के पूत के पांव पालने में दिखने का एक अच्छा-खासा एस्टीमेट दरोगवा को मिल गया था!

अंतिम घंटी के बाद प्रतिपक्षी धड़े का एक छात्र परिचित सा मुस्कान बिखेरने की कोशिश करता हुआ सियाराम से मिला था अकेले में। उसने दोस्ती का हाथ भी बढ़ाया था आगे, पर ऐन वक्त पर दाहिने हाथ से अपना कान खुजाने लगा था सियाराम। उसके कानों को फुसफुसाहट मिली थी, “सियाराम भाई, हमारा-तुम्हारा भला क्या बैर? तुम चाहे जहां बैठो, बस, हमारा आदमी बन कर रहो। इसमें तुम्हारा भी फायदा है और हमारा भी।” उसके दाहिने कंधे पर अपना बायां हाथ रखते हुए उसने अपना कहना जारी रखा था, “तुमसे बस, एक विनती है कि आगे और कौन-कौन बैठेगा, उसकी फिक्र तुम मत करो। तय करना हमारे जिम्मे रहने दो। हां, अगर, तुम्हारा कोई एकाध और दोस्त आगे बैठना चाहे तो भी कोई दिक़्क़त नहीं।” सियाराम ने अपने कंधे को झटक उसके हाथ से पीछा छुड़ा लिया था। सियाराम अपने हस्ताक्षरों से सरेआम दर्ज बुलन्द इबारत पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं हुआ। वैसे भी, सियाराम की इबारत में एक प्रजातांत्रिक स्पेस था- “अगली बेंच पर बी.सी. भी बैठेगा…।”

सियाराम पासवान ने कॉलेज में अपनी व्यक्तिगत जीत का झंडा गाड़ दिया, पर चित्त-पक्ष तो जीतने का आदी था, हार को देर तक अपने घर टिकने देने की परम्परा नहीं थी उसके यहां; साम-दाम-दण्ड-भेद से विजय पाने की परंपरा थी यह। पहले दांव में पटखनी पाया यह पक्ष अब आगे की रणनीति और व्यूहरचना पर काम कर रहा था। वह पछाड़ खाने को हरगिज तैयार न था। तरकश में शेष बचे तीर की तरह अपने सीनियर्स और ‘अपने’ शिक्षकों के अनुभवों से लाभ लेने का सुलभ विकल्प अभी उनके पास बाकी था। मंथनोपरांत कक्षा में टंटा पसारने, वर्चस्व साबित करने का विचार आक्रमणकारी पक्ष ने तत्काल भले ही त्याग दिया था लेकिन, वर्चस्व स्थापित करने के उसके पास अन्य विकल्प मौजूद थे जो उनके सीनियरों के अनुभव-प्रसूत थे और नए शिकार के ऊपर आजमाए जाने शेष थे। वो कहते हैं न, कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती।

और, एक दिन इन बिगड़ैल सवर्णों का कहर दरोगवा पर ही बरप गया। अपनी कमीनगी का ‘आदर्श’ नमूना पेश करते इन उद्दण्ड छात्रों के एक झुंड ने बेबात ही इस निहायत सुशील छात्र, दरोगवा को अकेले पाकर कैंपस में ही लप्पड़-थप्पड़ और जूतमपैजार कर उसकी पैंट शर्ट के चीथड़े-चिथड़े कर डाले थे जालिमों ने। सवर्ण-इल्जाम के शब्द थे, “अबे डोमबा, तूने हमें आते देखा तो रास्ता क्यों नहीं छोड़ा? अपनी हरिजनी औकात कैसे भूल गए तुम? खैर, तुम्हारी इस गलती और दुस्साहस की हम इतनी ही सजा दे रहे हैं आज; आइंदा, होश में रहना और संभल कर चलना, नहीं तो बेटे तेरी खैर नहीं।” इस बीच मां-बहन की मनभर गालियों से दरोगवा के समस्त कुल-खानदान को ताड़ दिया था सो अलग। एक लात पेट में जड़ते हुए एक की टिप्पणी आई, “मादरचो…, देखो तो, नाम क्या है इस गीदड़ का, दारोगा! हुंह! बाप चमार बेटा दिलीप कुमार!” चप्पल सूंघाते हुए दूसरे को रचनात्मक व्यंग्योक्ति सूझी- ” अरे, ई सढ़वा तs डोम हउ न! तनिक कहवतबा के ठीक करके अइसे बोल, “बाप डोमार अउर बेटा दिलीप कुमार!” और, वर्ण-विषैले ठहाकों से वातावरण गूंज उठा था। संभव है, दरोगवा पक्ष के भी दूसरे किसी ने इस घटना को देखा-सुना हो, पर हाथ जलाने कौन आता!

दरोगवा जब रोते-कराहते उसी नुचे-फटे कपड़ों में प्रिंसिपल के पास अपनी फरियाद लेकर पहुंचा तो उसके साथ क्या कुछ घटा था, उसकी मलिन-मर्दित देह-दशा ही साफ बता रही थी।

प्रिंसिपल ‘भू’ धातु का बना था। शहर के पास के ही एक कुख्यात भू-धातु बहुल गांव का था। उसके एक सहोदर भाई का बाहुबली ठेकेदार होने का इलाके में डंका बजता था। प्रिंसिपल भी उसका सुयोग्य भाई होने की हैसियत और योग्यता रखता था। उसने पहले तो दरोगवा का पूरा बायोडेटा मन-ही-मन स्मरण किया। फिर कोई सहानुभूति दिखाने की बजाय जमकर उसे कोसा और डांट पिलाई। उस एकलव्य को अपना द्रोणाचार्यीय गुरु धर्म निभाते हुए प्रिंसिपल ने कुछ यूँ बेइज्जती भरी प्रशंसा करते हुए समझाया, “अरे दरोगवा, तू तो बड़ा सुधुआ लड़का था रे, और पढ़ने में तेज भी। लेकिन एकबैक नमरी बदमाश कैसे बन गया तू? बड़ा भितरघुन्ना निकला रे तू! सुनते हैं, आजकल सबसे मारपीट किये चलते हो? अभी कुछ लड़के आए थे मेरे पास, तुम्हारी नालिश कर गये हैं।” सवर्ण छात्रों का गिरोह पहले ही प्रिंसिपल के पास आकर उसे अपनी शौर्य गाथा सुना चुका था। अपने लोगों की शौर्य गाथाएं प्रिंसिपल को पसंद थीं!

दरोगवा के लिए प्रिंसिपल का उपदेश जारी था, “कहां तो तुम्हारे गरीब मां-बाप अपना पेट काटकर तुम्हें लिखने-पढ़ने भेजते हैं और तुम लोग हो कि झगड़ा-फसाद बेसाहते चलते चलते हो। देख डोमवा, अपन औकाते में रह। बेसी लबरधोधो में मत रह, न तs बर्बाद हो जएबे। सहकर रहना सीख। सहकर रहबे तs पढ़ लिख सकबे अउर अप्पन गवार मां-बाप अउर सड़ल-गलल खानदान के उद्धार करबे!” उपदेश के अंतिम चरण पर ‘कड़वे वचन’ में टीवी पर उपदेश देते जैन मुनि सा साधुमन हो गए प्रिंसिपल का खास जोर था, “और हां, सुन दरोगवा! उ लरिका सबसे उलझे के बेवकूफी आगे भी मते करिहे! ऊ सब आग है आग है! लपेट में पड़बे तs झुलस जैबे! ई भी याद रख, सीसा हो के पत्थर से टकराए के जुर्रत करबे तs चूर-चूर हो जएबे।” सच्चाई उगलते-उगलते प्रिंसिपल की भाषा कुछ अधिक ही ओजपूर्ण और ‘लोकल’ हो गई थी। दिल की बात करने के लिए कई बार यह लोकल टच जरूरी भी होता है!

दरोगवा की याचनामय आंसू से भीगी आंखें अभी भी किसी चामत्कारिक वर अथवा आश्वासन पाने की आशा में प्रिंसिपल की ओर टंगी थी, गुरु पद में विश्वास बचा था गोया! इधर, प्रिंसिपल के अंदर का खूंखार ब्राह्मणवाद अपने नाखून और दांतों को और धारदार बना रहा था। वह अपना सारा गुस्सा, नफरत और तिरस्कार भाव संचित कर चीख पड़ा- “अबे बुरचोथू डोमवा! टुकुर-टुकुर मुंह क्या ताकता है और ई घड़ियाली आंसू काहे बहाता है? हरामजादा, भागता है यहां से या दूं चमेटा खींच के!” बमरेटी प्रिंसिपल ने अपना बायां हाथ उसके दाएं गाल की तरफ बढ़ाया था। दरोगवा अपना सा मुंह लेकर प्रिंसिपल चैंबर से निकल गया था।

अगले वर्ष से दरोगवा का एक बड़ा आर्थिक सहारा, कॉलेज से मिलने वाली छात्रवृत्ति भी रुक गयी थी।
°°°°°°°°°°°°°

Language: Hindi
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