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24 Jan 2024 · 1 min read

तुम जा चुकी

और आख़िर में ये सत्य की
तुम जा चुकी हो
जब जेहन को कुरेदती है न तो ग़ज़ल नग्में कविता नहीं उग आते अपितु बहते है पस और रेहा रेहा कर उठता एक टिस
जो ना मरने देता है और ना जीने बस अपने आगोश में मुझे जकेर रखता है अंत हिन दर्द के लिए ।

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