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28 Jan 2024 · 1 min read

जंग अहम की

जंग कोई भी हमेशा बेकार है
इसमें तबाही बेहद अपार है ,

धन – तन ख़ाक़ हो जाते हैं
मन जल कर राख़ हो जाते हैं ,

अंहकार इतना बड़ा नहीं होता है
मानवता के आगे खड़ा नहीं होता है ,

मानव चित्कार से कान फट जाते हैं
फिर भी हम ज़िन्दा रह जाते हैं ,

जंग की आग हर जगह धधक रही है
घरों में देश में संसार में भभक रही है ,

क्यों इसमें ज़िद का तेल डालना है
और जीवनभर का दर्द पालना है ,

सारी शिक्षा सारा ज्ञान सब बेकार है
जब तक सर पर जंग की तलवार है ,

इस जंग के माहौल में शांतिदूत बनना है
सही मायने में ख़ुद को साबित करना है ,

आओ सारा अहम ताक पर रखते हैं
शांति का एक कदम अग्रसर करते हैं ।

स्वरचित एवं मौलिक
( ममता सिंह देवा )

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