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3 May 2024 · 1 min read

ग़ज़ल

दे रहे लफ्ज़ यूँ खलल शायद !
हो रही हो कोई ग़ज़ल शायद !

फूट निकले हैं आज झरने-से,
अश्क़ पानी में गए ढल शायद !

यूँ लगे जैसे आज कुदरत से,
आदमी ने किया है छल शायद !

भूख , तालीम और बेकारी,
खोज लेती है अपना हल शायद !

छींक अख़बार में छपी उनकी,
जुर्म ने फिर किया है छल शायद !

बात अखलाक की सभी करते,
कोई करता नहीं अमल शायद !

आज रोते नहीं बना उससे,
दर्द उसका गया उबल शायद !
०००
—- ईश्वर दयाल गोस्वामी ।

Language: Hindi
2 Likes · 42 Views
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