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5 Jul 2018 · 1 min read

ग़ज़ल

रंजो-गम अपना, छुपाना आ गया है।
हां, मुझे भी मुस्कुराना आ गया है।।

अब न रुसवा कर सकेंगे अश्क मुझको।
आंख में उनको दबाना आ गया है।।

जो निगाहें सामने उठती नहीं थीं।
उनको अब नजरें मिलाना आ गया है।।

अपना सब कुछ सौंप दूं, मैं कैसे उसको।
चेहरे पे चेहरा लगाना आ गया है।।

तब से सहमी-सहमी हैं कलियां चमन की।
जब से माली को सताना आ गया है।।

रिश्ते बौने हो गए बदली फिजा में।
कितना बदतर अब जमाना आ गया है।।

हर गली-कूंचों में हैं बहशी-दरिंदे।
नांच हैवानी रचाना आ गया है।।

हैं कहीं पर सिसकियाँ, चीख़ें कहीं पर।
मुस्कुराहट को मिटाना आ गया है।।

दिल भले ही न मिलें पर ‘विपिन’ को भी।
हाथ सबसे ही मिलाना आ गया है।।
-विपिन शर्मा
रामपुर 9719046900

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