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Jun 20, 2016 · 1 min read

ग़ज़ल :– महँगाई (व्यंग)

!! मंहगाई !! [गजल]

बेबस और बेजान हैं सब अपने घर वार मे !
आंसू ले दस्तक दिये सावन के त्योहार ने !!

अच्छे दिन की होड मे न्योत दिये मेंहमान !
हालत खस्ता कर गई मंहगाई की मार ने !!

लेखा जोखा लगा लगा कर चिन्तन करते भाव !
अंक गणित हमे सिखा गई मंहगाई उपहार मे !!

खा पी कर मोटे हुए जब हल्के थे दाम !
डाइटिंग करना सिखा गई मंहगाई एक वार मे !!

मन की टेंसन दूर हुई हुआ रक्तचाप सामान्य !
धंधा मंदा पड गया मंदी के व्यापार मे !!

गर्दी ट्रेन पे कम हुई सफर हुआ आसान !
कदम फूंक-२ कर रखते सब मंहगे बाजार मे !!

अनुज तिवारी “इन्दवार”

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