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7 Jun 2016 · 1 min read

ग़ज़ल — ज़माना ढूँढते हैं !!

ग़ज़ल — ज़माना ढूँढते हैं !!

प्यास लगे तो पैमाना ढूँढते हैं !
भरी महफिल में मयखाना ढूँढते हैं !!

जाम आशिकी का पीने वाले !
महबूब की बाहों में ठिकाना ढूँढते हैं !!

तीर नज़रों से घायल दिल अब !
मदहोश आँखों में आशियांना ढूँढते हैं !!

कहीँ महफिल यादगार बनी !
कोई ग़म भुलाने का बहाना ढूँढते हैं !!

“अनुज” आज भी “इंदवार” में जाकर !
अपना वो गुजरा ज़माना ढूँढते हैं !!

अनुज “इंदवार”

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