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14 Mar 2023 · 1 min read

खता मंजूर नहीं ।

ऐसी क्या बात हुई उनसे,
की रूठ गए खुद से ,
मनाने की खता करना,
उन्हें दिल से मंजूर नहीं।

मुहब्बत में लब्जो को तो,
दिल से लगाना खता भी है,
खामोश है निगाहे उनकी,
इसारो से मनाना मंजूर नहीं ।

कहीं रूठ न जाए ये पलके,
सरमाना यूं भूल न जाए,
हुई खता इन नजरोंं से भी
नजर का लगना मजूर नहीं।

दिलोंं और जान से ,
मोहबब्त हुई है जो तुमसे,
हुई खता इन होठो से भी है
इन ओठों को जताना मंजूर नहीं।

रचनाकार
बुद्ध प्रकाश
मौदहा हमीरपुर।

Language: Hindi
3 Likes · 1 Comment · 239 Views
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